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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 905

बोधसागर

( ३७ )

जो साहब सतलोक रहाई । तिनको सब कोई चीन्हौ भाई॥
नाम बिना दुखि तीनों देवा । जिनकी गन गंधर्व करें सेवा ॥
जगके देव सब काल अधीना । बचे सोई जो नामको चीन्हा ॥
हम बल एक शब्दका भाई । ताही बल हंसा सुत्काई ॥
जहाँ नाम काल गति नाही । बिना नाम है कालकी छाई ॥
ज्ञान हीन जाने नहीं भाई । जीव कै सँग मन काल रहाई ॥
जीव के संग कालको वासा । अज्ञानी जन गहे विश्वासा ॥
मनको कहो न कीजे कोई । मन जिवको भरमावे सोई ॥
कहे कबीर मन जात गँवारी । मनको कहो न करो नर नारी ॥
मनको कहो जो कर है भाई । भवसागरमें देय बहाई ॥
मन चंचल सो काल है भाई । मनको त्यागे निरमल हो जाई ॥
मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥
मन थिरकर परमात्म जाना । यहि विधितत्त्वलेय पहिचाना ॥
काल जाल ते तेही छूटे । काल विचारा ताहि न लूटे ॥
यही भेद धर्म सुन लीजे । शब्द माहि तुम बासा कीजे ॥
काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥
काल चरित्र तुमसे कहो भाई । यही भेद कोई नहीं पाई ॥
काया माया झूठी जानो । झूठा सकल पसारा मानो ॥
झूठो नाम साहबको नाही । बूझ लेव अपने हिय माहीं ॥
साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय सब धाय ।
कालपाय सब विनसही, काल काल कह खाय ॥
सोरठा-धर्मदास लेव जान, मुन्य सुरूपी मनहि है ।
वचन कबीर प्रमान, रूप रेख मनको नहीं ॥

चौपाई

परम पुरुष नाम गहो भाई । ताते हंसा लोक सिधाई ॥
आदि नाम है जिव रखवारा । उनको सब कोई करो पुकारा ॥