कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 894, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६ )
ज्ञानबोध
यह जग आंधर जानो भाई । नाम न जाने ऊँच कहाई ॥
ऊँच वही जो नामहि जानें । विना नाम सब नीच कहानें ॥
ना कोउ वर्ण नहीं कोउ भेषा । शब्द सरूपी जैहै देशा ॥
सब मिल भक्ति करो रे भाई । सतगुरु मुखसे यह फरमाई ॥
यह सतगुरुका ज्ञान है भाई । जो कोइलखे सो लोक सिधाई ॥
जात वर्ण हम भाख सुनाई । धर्मदास जगसे कहो जाई ॥
ऐसा तुम जग जान लख वो । सत्तलोकमें जिव पहुँचावो ॥
साखी-यह जग त्रयगुण भक्तमें, धूल परे धर्मदास ॥
नाम गहे विश्वास करि, जाय पुरुषके पास ॥
माना कहा कबारकी, सबको यहै पुकार ।
भरम जाल सब त्यागदे, गहले नाम अपार ॥
सारठा
जिन सब न म आधार विना नाम भव ना तरे ।
जाय काल दर्बार, सत्तपुरुष जो ना गहे ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहों तुम पास ॥
अकह हतो पुनि कहा बखानी । उत्पति प्रलय हती मम वाणा ॥
आदि न अंत हती नहि माया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥
सोहं ब्रह्म न नहि ओङ्कारा । काल निरंजन नहि औतारा ॥
दश आतारन चौबीस रूपा । तब नहि होता ज्योति स्वरूपा ॥
जब नहि चंद्रलोक दीपविस्तारा । तब नहि सुकृत करचो संसारा ॥
जब नहि लाक चंद्रसूर्य अरुतारा । तब नहि तीनों गुण औतारा ॥
वहां नहीं है दिन अरु राती । ऊच न नीच जात ना पांती ॥
नाही मुख पवन नहि पानी । समरथ गति काहू नहि जानी ॥
आदि ब्रह्म नहि करे पसारा । आप अकह तब हता नियारा ॥