कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 893, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( २५ )
यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥
ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥
तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥
जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥
ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥
सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥
ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥
धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥
जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥
जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥
दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥
जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥
चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥
जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥
दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥
जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥
जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥
भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥
राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥
एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥
ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥
डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥
सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥
ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥
जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥