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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 817

बोधसागर

( ७७ )

आतशे उलफत तुफे सोजान इश्क ॥
कलल जालिम तूने दोनों को किया ।
इस परी रूसे जुदा मुझको किया ॥
जान इसकी तो हुई तनसे बदर ।
जिन्दगी में मैं हूँ मुर्दा से बतर ॥
यह तो मर कर हिज्रके गमसे छुटी ।
तलमलाहट मुझको है अबतक वही ॥
वहशिया की तरह अपना माजरा ।
कह रहा था उस परीरू स गदा ॥
वा जवाने हाल तो देती जवाब ।
इश्क है आसौ तरहके पेच ओ ताब ॥
मुझसे अपने दर्द गम कहता है क्या ।
मरगई मैं तूतो जिन्दा भी रहा ॥
इससे बरतर क्या है दर्द ओ रंज इश्क ।
जीती मैंने बाजिये शतरंज इश्क ॥
जीको अपने करदिया उसमें फना ।
मुझसे तू कहता है क्या यह माजरा ॥
देख कर अद्दम के यह रंजो महन ।
हो गया बहरे तरहुम मौजजन ॥
देख कर उसमर्दके दिलका कलक ।
जोश में आयी इनाय तहाय हक ॥
कुदरते हक ने किया असबाब जमा ।
जिससे यह दोनों हुए अहबाब ॥

इस प्रकार अद्दमशाह शाहजादी के मृतकसे अपने विरह की बातें करता और रोता जाता था उसकी ऐसी दशाको देखकर