कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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मुलतानबोध
मुझमें क्यों चाहेथी वह नादिर गोहर ।
दो बरसतक क्यों रखाथा बहू पर ॥
अहद गर तुझको वफा करना न था ।
मुझको जिन्दःछोडकर मरना न था ॥
तुझमें कुछ बूए वफादारी नहीं ।
यार होकर शवये यारी नहीं ॥
तुझको गर दुनियाँसे करना था सफर ।
साथ लेना था मुझको ऐ सीम्बर ॥
रुह तेरी बाद जन्नतको गयी ।
देगयी इस रक्त जाँको बेकली ॥
हालकी मेरी खबर भी है तुझे ।
कल नहीं पड़ती किसी करवट मुझे ॥
बाग जन्नतमें किया तूने वतन ।
मैं रहा बहरे अलम में गोते जन ॥
हैफ है सद हैफ दीदारे हबीब ।
बाद मरनेके हुआ मुझको नसीब ॥
वाह ऐ चर्ख सितमगर वाहवाः ।
तूने जालिम क्या सितम मुझपर किया ॥
जीस्त में माना रहा दीदार से ।
बाद मरनेके मिलाया यारसे ॥
देखलेती यह भी मेरी बेकली ।
जोबर आती सब तमन्नाये दिली ॥
इसको भी शायद था कुछ मेरा कलक ।
हो गयी जो दमके दम में जांबहक ॥
खागयी इसको गमँ पिनहानः इश्क ।