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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 797

बोधसागर

( ५७ )

तबहि शाह दिल अपने जाना । नारी मैं अस होय न ज्ञाना ॥
यह तो मुशिद मालिक मेरा । धरचो रूप इन नारी केरा ॥
तबहि शाह दिलमाहि बिचारा । हम कारण इन यह तन धारा ॥
जो यह कहे मानि शिर लीजे । जाते कारज अपना कीजे ॥
अब मैं वचन मानि शिर लेऊँ । चरण कमल में मस्तक देऊँ ॥
हम पुनि गुप्त भये तेहि थाना । देखत शाह बहुत अकुलाना ॥
कहे शाह कही अस बाता । घाव अचानक किये मुहि जाता ॥
कछु दिन शाह विरहमें रहेऊ । बहुरि शाह दिल मोह सो गहेऊ ॥
तब दिन एक श्वान यक आवा । जाके शीस माहि बड घावा ॥
कीन माथ देह भरि जाही । कल बल करि व्याकुल तन ताही ॥
श्वान विकल डोले चहुँ ओरा । आयो शाह ढिग तबही दोरा ॥
सखी सहेली मारन धायी । शाह श्वान कहँ लीन बुलायी ॥
कहे श्वान सुनु शाह सुजाना । हमहुँ रहे बडे सुलताना ॥
सुख सम्पति पुनि तिरियारंगा । जीव सतावे बहुत अस अंगा ॥
सोना रूप कटक गज बाजा । अंत समय कोइ आवे न काजा ॥
साखी-मातु पिता सुत बाँधव, औरौ दुलहिन नारि ।
अंत समय सब बिछुरई, यह शोभा दिन चारि ॥

चोपाई

प्यासे जल नागे पट दीजै । भूके नाज मिहर दिल कीजै ॥
जैसी परी आप कहँ जानो । तैसी सकल जीव पहिचानो ॥
हवा हिस तन साधो भाई । साधो पीर मिटै दुचितार्ई ॥
इतना कही श्वान उठि धाया । सखी सहेली मोह लगाया ॥
पुनि हम कहा गैब की बानी । सुनहि शाह सह सखी सयानी ॥

आकाश बानी

यह नर नरकहि फेर बनाया । तुम तो बहुत नरक मन लाया ॥
सखी सहेली काम न आवे । जबही धरि यम आनि सतावे ॥