कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 796, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५६ )
मुसलमानबोध
❁ सुनि कर शाह अचम्भा भयऊ । ऐसो वचन कबही नहिं कहेऊ ॥
भयो ज्ञान शाह सुनि वानी । काल कला फिर आनि समानी ॥
अरुझे शाह स्वाद सुख पायी । भयो मगन मन अति ललचायी ॥
साखी-सखी सहेली सँग लिये, करत रंग अरु राग ॥
बिसरे ज्ञान विचार सब, मोह बान उर लाग ॥
चौपाई
यक दिन शाह सेजहीं सोया । तोशक झूल विछौना जोया ॥
देह उण्ण छेह अवसर ताही । नींद न आवे बहुत सिसाही ॥
कोई सखि पंखा पवन डुरावे । कोह चन्दन घसि अङ्क लगावे ॥
तबहू नींद न आवे शाहा । बहु व्याकुल अतितन भइ दाहा ॥
एक चरित्र तहाँ हम कीना । साखी रूप धरि दर्शन दीना ॥
सुबुधि सखी जोरे दोह पाना । सुनिये एक अरज सुलताना ॥
कहूँ वचन परमारथ जानो । सुनत कोध दिल जो नहिं आनो ॥
यह तन पाय बहुत सुख कीना । कबहू धनी नहीं दिल दीना ॥
जिन साहिब यह देह बनावा । तख्त सेज सुख राज करावा ॥
कोठा कोट अमीरी भारी । गज औ तुरंग हरष संग नारी ॥
ऐसा साहिब क्यों विसराये । राग रंग चित अति हरषाये ॥
जब वह साहिब कोप कराई । तेहि समय को होय सहाई ॥
साखी-साहिब गीझे जेहि समय, देह विहिश्त को वास ॥
मालिक मेटे पलक में, करइ राज सुख नाश ॥
चौपाई
आखिर देह मिलेगी खाका । साहिब नेह करि होऊ पाका ॥
वचन सुनत चित गहबर भयऊ । आँसू बहुत चक्षु ते गयऊ ॥
१ इस चौपाईसे लेकर आगे जिस चौपाईके अन्तमें इसी प्रकारका फूल दिया है वहाँ तक पुरानी प्रतिबोधि नहीं है ।