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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 729

बोधसागर

( १४९ )

रामचन्द्र वचन

अकथ कथा कहीं नहीं जायी । कहो ऋषिराय बात समझायी॥
तुम तो धोखा बहुत उपजाये । ऐसी मुँदरी कहाँ तुम पाये ॥
सोई बात कहो समझायी । जाते संशय जीका जायी ॥

मुनीन्द्र वचन

मुनीन्द्र बोले राम चित धरिया । एति बार तुमसृष्टि औतरिया ॥
जिते आकाश में तारा ठयऊ । उते लंका में रावण भयऊ ॥

सारखी-नगर अयोध्या राम तुम, भये अनेकहिं वार ।

अपनी आदि भुलाइया, तुम कैसे करतार ॥

रामचन्द्र वचन-चौपाई

रामचन्द्र कहे सुनो ऋषिराई । तुमरी गति मति कही न जाई॥
अजहूँ शिखापन हमको दीजै । जाते काज सिद्धि करि लीजै ॥
काष्ठ समान गिरपर्वत भारी । सेना उतारि सकल भइ पारी ॥

सत्यकबीर वचन

पुरुषोत्तम परतीति बैठायी । ताते काज सिद्धि तब पायी ॥
जाउ ससुद्र तुम अपने ठाई । यहि गुनाह मोहि बखशो भाई॥
तुम दाता हम भिक्षुक तुम्हारे । तुमरी साख बडी संसारे ॥
तुम छीलर न होउ बकशो भाई । हम तो जाते यज्ञके माही ॥
अब तुम जाहु अपने ठाई । कश्चन द्वारिका लेहु बुडाई ॥
जगन्नाथ की महिमा होने दीजै । कश्चन द्वारिका जलमें कीजै ॥
मानि वचन गयो अपने ठाई । या विधि दीन ससुद्र हलाई ॥
इतना कहि हम ठाकुर पर गयऊ । लक्ष्मी रु राम त्रिभुवन रहेऊ॥
छप्पन भोग चढै है द्वारा । लागा भोग ठौरहीं ठौरा ॥
परोसै पण्डा बडी पकौरी । दाल भात और खीर मुंगौरी ॥
बहु अचार गिनो नहीं जायी । छप्पन भोग परोसे आयी ॥