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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 728

( १४८ )

लक्ष्मणबोध

तेहि अतिदुःखित जब हम देखा । तब हम पृथ्वी ओर अवरेखा ॥
चहुँ फेर बना कंचन का कोटा । ता बिच बैठा रावन खोटा ॥
लक्ष्मण इन्द्रजीत कहावैं । हम चेतावन ताको जावैं ॥
प्रथमै हम रावण गढ गयऊ । तब हम तपसी वेष धरयऊ ॥
जब हम रावन सों बात जनाई । वह काठे खडग हम पर भाई ॥
तब हम आडा तृण जो दीना । घाव अठारह तृण पर कीना ॥
कटे न तृण खिसियाना भयऊ । जाय घाव स्वम्भपर कियऊ ॥
कटि गया स्वम्भ भया दो भागा । सो मंदोदरि दृष्टिहि लागा ॥
तृणके ओट सो सृष्टिका करता । जग देखत ही भूले समता ॥
कहैं मंदोदरि गहि ता पाई । गरब न छाडे रावन राई ॥
तब हम चले ताहि वन गयऊ । लक्ष्मण राम दोऊ जहैं रहेऊ ॥
देख लक्ष्मण धायके आया । आवतही अस वचन सुनाया ॥

लक्ष्मण वचन

कहे लक्ष्मण सुनो ऋषिराई । पिता हुकुम मेटो नहिं जाई ॥
भरत दे राज राम बन अयऊ । तापर दुष्ट दगा जो कियऊ ॥
सीता हरी रावन तेहि ठाऊँ । मैं तो शरण तुम्हारे आऊँ ॥

सत्यकबीर वचन

लक्ष्मण देखि भयी मोहि दाय। अर्चित नाम हम ताहि सुनाया ॥
अर्चित नाम का किया विवेका । गिरिपर लिखी सत्यकी रेखा ॥
काष्ठ समान सो गिरिवर तारी । उत्तरी सेना सकल भयि पारी ॥
तबही राम लक्ष्मण फरमावा । हमको सुन्दरी आनि चढावा ॥

मुनीन्द्र वचन

तब कहैं मुनीन्द्र सुनो रघुराई । सुन्दरी धरो कमण्डलमाई ॥
तबहि रामजी आप सिधाये । सुन्दरी डारि ऋषी पै आये ॥
तब मुनीन्द्र यह बात सुनाई । लाओ सुदिका दिखाओ भाई ॥
देखि कमण्डल चकृत भये भाई । सोचे राम अपने मनमाई ॥