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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 593

बोधसागर

( १३ )

देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥
बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥
सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥
पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥
कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥
राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥
अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥

सुकृत बचन

सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥
जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥
तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥

राजा भोपाल बचन

विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥
ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥
छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥
हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥
चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥
दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥

सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥
आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥

बचन-चौपाई

एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥
भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥
दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥