कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 592, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२ )
शोपालबोध
सत्गुरु वचन
नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥
बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥
साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥
कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥
सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥
लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥
दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥
लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥
जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥
काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥
लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥
सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥
छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥
आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥
बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥
हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥
हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥
सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥
बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥
ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥
सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥
सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥