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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 486

(४२)

ज्ञानप्रकाश

सर्वानंद वचन

कहै विप्र देख्यो तुव ज्ञाना । फिरिजोलहा तुम्हजातिअयाना॥
ऐसे समय राम तुम्ह बोले । कहा कहो हरि त्रास न डोले ॥

कबीर वचन

अहोविप्र मोहिं कहहु बुझाई । कौनी सभै रामलौ लायी ॥

सर्वानंद वचन

कहा सर्वानन्दमुनहु जोलाहा । करम नीति भाषौ तोहि पाहा॥
वेद प्रमान लै माटी पानी । तबमुख शुद्धराम जपुजानी ॥

कबीर वचन

अहो विप्र जो हम अस करहीं । तौ मुख शुद्ध होय संचरहीं ॥

सर्वानन्द वचन

कहै विप्र है वेद प्रमाना । तब मुख होय पवित्र सुजाना ॥
यह कहिचलिभौ सुरसरितीरा । कर पग मज्जहिं मुखदे नीरा ॥
हम पुनिकर पगु मजे लीन्हा । कर पखारि पुनि कुछा कीन्हा॥
कुछा कीन्ह द्विजवचन प्रमाना । एक कुछा तेहिं ऊपर ताना ॥

सर्वानन्द वचन

चिहुँकि उठे द्विज यहका कीन्हा । फिरिजोलहा तुम्हजाति कमीना ॥

कबीर वचन

हो सर्वानन्दमुख शुचि भयऊ । कुछा कीन्ह अशुचि तर गयऊ॥
यहिविधि मुखशुचि तुम भाषा । तुम्हरो कहा हिये महाँ राखा ॥
हो सर्वानन्द तुझ बड ज्ञानी । सत्य नाममर्मअजहूँनहिजानी॥
रज अरु बीज नरककी देही । सदाअशुचि शुचिनाम सनेही ॥
जो मल तजत प्राण करे गवना । करमुख शुचि हरिजप कवना ॥
समुझि शब्दसो रहु मुखचाहू । उत्तर कछु तब दीन्ह न ताहू ॥
पुनि द्विजमंजनलागु शरीरा । ताभ्रपात्र एक लीन्ह कबीरा ॥