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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 485

बोधसागर

(४१)

गुनहीं विप्र बहुत हिय माहीं । पुनि हमहू गै भेटेऊँ ताहीं ॥
कुशल प्रश्न पूछी सनमाना ॥

सर्वानन्द वचन

कहे पण्डित सुई मरम नहि जाना ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनो द्विजराई । अम्बु सुईगमि कहो बुझाई ॥
पठयउ जलभरि अस अनुमाने । हम विद्या सम्पूर्ण अघाने ॥
जिमि वरतन जलअम्बुन समाई । तिमिहम विद्या रहे अचाई ॥
भरै महाँ का भरै कबीरू । अस तुम्हरे चित सुनमतधीरू ॥
तुव हियगमि जानि द्विजराई । तब दीन्हही जल सुई एक नाई ॥
जौ विद्या सम्पूर्ण हो भाई । तौ शब्द हमार बेधि तोहिजाई ॥
सुनि पण्डित चितसम्भव आना । हृदय कहै अगमइन ज्ञाना ॥
तेहि क्षण रहेऊँ हिये अनुमानी । प्रातहिं करब गोष्ठि कहानी ॥
छन्द-तेहि दियो आसन आत्म पोषन भाव सहित समपैऊँ ॥
द्विज कीन्ह भोजन सेज पौदे रैनि हिये बहु तकेऊँ ॥
चिन्ता करत बहुत गुनावन वेद विधान ज्ञान अटावहीं ॥
होत प्रात कीजे वाद जो लहहिं जीव युक्ति अटावहीं ॥
साखी-वीतेउ रैन प्रभात औ, करि विचार मन माहँ ॥
सत्यनाम पद सुमिरिकै, पहुँच गये तिहि पाहँ ॥
सोरठा-भयेउ विप्र उठि ठाढ़, गयेउ जंगलकी दिसा ॥
करत तरक चित गाढ़, बैठे तजे शरीर मल ॥

चौपाई

हम गै रामनाम तेहि कहेऊँ । सुनतहिविप्रहृदय अति दहेऊँ ॥
भयेउकोप अतिकीन्ह प्रसन जल । इच्छायुक्ति नासिकै तजीमल ॥