कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( १५ )
कहणा मय वचन
सुनो राय तुम नृपति सुजाना । जो जिव शब्द हमारा माना ॥
ते पुनि आय पुरुष दरबारा । बहुरि न देखे वह संसारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जो निजमाने बात हमारी ॥
पुरुष दर्श नरपति चितलायी । हंस रूप शोभा अतिपायी ॥
षोडश भानु रूप नृप पावा । जानुमयंकम ढार बनावा ॥
धर्मदासवचन छन्द
धर्मदास विनती करे, युग लेख जीव सुनायऊ ॥
धन्य नाम तुम्हारा साहिब, राय लोक समायऊ ॥
तत्त्वभाव न गहेउ राजा, भक्ति तुव निजठानिया ॥
नारिभक्ति प्रतापते, यमराजसै नृप आनिया ॥६६॥
सो०-धन्यनारिकोज्ञान, लीन्ह बुलायस्व नृपति कहैं ॥
आवागमन नशान, जगमें बहुरि न आइया ॥६९॥
ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परबीना ॥
कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पतिनागर ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
धर्मनि पुनि आये जगमाहीं । रानी पति ले गये तहांहीं ॥
राख्यो ताहि लोक मंझारा । तत छिन पुनि आयउ संसारा ॥
काशी नगर तहां चलि आये । नाम सुदरशन सुपच जगाये ॥
सुपच सुदर्शनकी कथा
नाम सुदर्शन सुपच रहाई । ता कहे हम सतशब्द दृढाई ॥
शब्द विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि शब्दके मेला ॥
निश्चय वचन मान तिन्ह मोरा । लखि परतीत वंदि तिहि छोरा ॥
नाम पान दियो मुक्ति सँदेशा । मेटचो सकल काल कलेशा ॥