कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 222, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ९४ )
अनुरागसागर
सो०-धन्य राय सुज्ञान, आनहु ताहि हंस ॥
तुम गुरुदयानिधान, भूपति बंद छुड़ाइये ॥६८॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुन ज्ञानी बहुतै विहँसाये । चले तुरंग बार नहिं लाये ॥
गढगिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधी नियराया ॥
घेरेचो ताहि लेन यमराई । राजहि देत कष्ट बहुताई ॥
राजा परे गाढ़ महाँ आया । सतगुरु कहै तहाँ गुहराया ॥
घोड़े नृप नाहीं यमराई । ऐसे भक्ति चूक है भाई ॥
भक्ति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर यम करे विहाला ॥
चन्द्रविजयका करगहि लीन्हा । तत्क्षण लोक पयाना दीन्हा ॥
रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती के सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥
राजा चन्द्रविजय वचन
राय कहैं सुनु हंस सुजाना । वरण तोर षोडश शशिमाना ॥
अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहाँ तोहि मैं नारी ॥
तुम तो भक्त कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥
धन्य गुरु अस भक्ति दृढ़ाई । तोरि भक्ति हम निज घर पाई ॥
कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥
हम तो राजकाज मनलाया । सतगुरु भक्ति चीन्ह नहिं पाया ॥
जो तुम मोरि होत ना नारी । तो हम जात नरककी खानी ॥
तुवगुण मोहि वरणि ना जाई । धनगुरु धन्य नारि हम पाई ॥
जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैसे मिले सकल संसारी ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
मुनत वचन ज्ञानी वहसायी । चन्द्रविजय कहैं वचन मुनायी ॥