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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २०३८ )

बोधसागर

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जबलों देह सत्यकरि जानी । तबलों पिण्ड तरे नहिं प्रानी ॥
आदिमें अण्ड रूप यक रहेऊ । हिरण्यगर्भ ताहीको कहेऊ ॥
हिरण्यगर्भ निज मनहि विचारा । द्रन्द्व खेल तेहि काल सँवारा ॥
हिरण्यगर्भ प्रजापति मेला । ताते खिला जत्तको खेला ॥
फूटा अंड भयो द्वै धारा । ताते द्रन्द्व जत्त हितकारा ॥
द्रन्द्वमता संसारहि मेले । नर नारी दोउ जगमें खेले ॥
दोनों मिले होय तब रचना । सकल स्वरूप ताहिसे खचना ॥
जिहि अवसर जिव भर्महि भंडा । जो कछु पिण्ड सोह ब्रह्मण्डा ॥
आपै लखे लखो सब जाई । आपहिमें सब सृष्टि समाई ॥
माया ब्रह्म मेल जब होई । यह संसार खेल तब होई ॥
माया दीख ब्रह्म नहिं दरसै । शून्य स्वरूप ताहिको षरसै ॥
बिंदु रुधिर दूनों हैं पानी । अंड पिंड रचनाको खानी ॥
बिंदु पिता लोहू है माता । श्वेत अरुण कहिये द्वै बाता ॥
यकभो द्रन्द्व द्रन्द्व जब टूटे । हैं अनन्त सब जगमें फूटे ॥
रुधिरसे तीन धातु प्रकटानी । चाम मासु अरु रुधिर बखानी ॥
तीन धातु नर विन्दुसे होई । हाड अरु गूद विन्द कह सोई ॥
माता तीन पिता मलतीनी । ताते जगकी रचना कीनी ॥
माताको सब कोई लखि पावै । पिता काहुकी नजर न आवै ॥
मातामें रह पिता छपाई । ताते कोई देखि नहिं पाई ॥
माता जबहि पिता बतलावै । तब कोई खबर तासुको पावै ॥
माताको अभाव जब होई । पिता दरस तब कर सब कोई ॥
यह दृष्टांत मैं प्रकट बखाना । मायामें हमि ब्रह्म लुकाना ॥
चाम मास लोहू है बाहर । हाड अरु गूद विन्द है भीतर ॥
माता जैसे पिता छपावै । माया ऐसे ब्रह्म दुरावै ॥