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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2113

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जीवधर्मबोध

( २०३५ )

धन्य दीनता कह इञ्जीला । ताते हो जिव बंधन ढीला ॥
जूठी बेर सेवरी ल्याई । रामचन्द्र अति रुचिते खाई ॥
लक्ष्मन निर आदिरकर ताही । भिलनी जूठा हम नहिं खाही ॥
भई सजीवन बूटी सोई । लक्ष्मन प्रान बचायौ सोई ॥
पंडो यज्ञ जुरे ऋषि भूरी । स्वपचभक्त विन यज्ञ न पूरी ॥
जातिपातिकुलगुण अभिमानी । भ्रमत फिरे चौरासी खानी ॥
भगते भगवा भेष बनाये । शिव शंकर निज शीश चढ़ाये ॥
आदि भक्ति शिवजक्त प्रकाशी । भगवा भेष धरे संन्यासी ॥
भग पृथ्वीका रूप कहाये । तात भगवा वरन बनाये ॥
पृथ्वी तुल्य गरीबी आवै । संन्यासी जीवत मरिजावै ॥
बैरागी जो तिलक लगाई । ले मृतिका निजमाथ चढ़ाई ॥
आदम अघ तौ रेत प्रसंगा । कीनो प्रभुकी आज्ञाभंगा ॥
अदन बाहर आदन भैऊ । ताते प्रभु पुनि ऐसे कहेऊ ॥
खेहसे तेरी देह बनाई । जबलौ बहुरिन तेहि मिलिजाई ॥
तबलौं श्रम करिकरिके खैहो । अब नहिं अमृत फलको पैहो ॥
ताको ऐसो गहिये ज्ञान । जीवतही मिट्टी मिल जाना ॥
मुये तो सबही मिट्टी होता । पावै कर्म बीज यश बोता ॥
जीवतही लोधू मरजाना । यही सकल मतको परमाना ॥
चरनामृत अरु शीत प्रसादा । ताको आहि बड़ो मरजादा ॥
करिके कृपा साधु जो देही । दीनको शिष्य सेवक सो लेही ॥
ताको ऐसा अर्थ बिचारी । गहो गरीबी सब नरनारी ॥
बहुरि शिष्यसे भीख मंगवै । ताते तासु मान बिनसावै ॥
सुरगण जो अतिगुण गण धामा । आदमको कर दंड प्रणामा ॥
कारण यही तासुमें पायौ । प्रभु दीनताको श्रेष्ठ देखायौ ॥
कह आदम मिट्टीकी मूरत । कह इबलीस दीस शुचि मूरत ॥