कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
(२०२९)
हारे असुर सुरन जय पाया । विजइन मन अभिमान समाया ॥
जब देवन कीने अभिमाना । ब्रह्मरूप तब तहँ प्रकटाना ॥
ऐसो तेजमई सो रहेऊ । कोईसुर नहिं सन्मुख है सकेऊ ॥
सब सुर अग्नि पौनको टेरी । तेहि औसर तहँ दोउ कर फेरी ॥
सब सुर अग्नि पौनसे कहेऊ । ब्रह्मरूप जो प्रकटे भैऊ ॥
हम सन्मुख है सके न ताही । तुम करि कृपा तासु दिग जाही ॥
तादिग पौनदेव जब गैऊ । ब्रह्म ताहिते पूछत भैऊ ॥
तुम हो कौन कहा तौ कर्मा । पवन देवता भाज्यौ मर्मा ॥
नाम पौन सुर मेरो होई । जो कुछ होय उडावो सोई ॥
तहां रही यक तृणकी ढेरी । ब्रह्मसो पौनको पौकहि टेरी ॥
वह ढेरीको देह उड़ाई । पौनदेवकर बल अधिकाई ॥
यक तृण तासु न सका उड़ाई । बलकरि पवनदेव थकि जाई ॥
लज्जित पौन गौन धरकीने । अग्निदेव पुनि तहँ पग दीने ॥
पूछै ब्रह्म कौन तू भाई । अग्निदेव निजु नाम सुनाई ॥
पूछै ब्रह्म कर्म तो काहा । अग्नि कहे मैं सब कुछ दाहा ॥
कहे ब्रह्म तृणढेर जलावो । अग्निदेव वह जोर लगावो ॥
तृण यक भस्म न सो करसकेऊ । जोर लगाय अग्नि तहँ थकेऊ ॥
तब लजायके अग्नि सिंधारा । ब्रह्मा सो गुप्त भयौ तेहि बारा ॥
देवी प्रकट भई तेहि काला । देवनसे कहा बचन रसाला ॥
तुम अभिमान भंजवे कारण । ब्रह्मस्वरूप कियौ निजु धारण ॥
तुमरे मन हंकार जो आया । हम असुरनको मारि हटाया ॥
तुमरो कियौ होय कछु नाहीं । हानि लाभ विधिकी बस आही ॥
सर्वसमर्थ सर्वको दाता । ताकी गतिनहिं लर्यौ विधाता ॥
सो सबहीको खेल खेलावै । वाजीगर गतिको लखि पावै ॥
सबहीको जिन गर्व प्रहारा । लखि नहिं परत अलख करतारा ॥