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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2106

( २०२८ )

बोधसागर

. १२०

कछु नहीं ताको बस तहँ चाला। अंतकाल तेहि नकीमें डाला ॥
जीवकि वसमें जो कछु रहता। तौन सुकर्म नीच गति गहता ॥
वेशुवा बहुदिनको लेआयो। ईश्वर कृपा ताहि परछायो ॥
जबकन आनदेशमें आया। तह बल्लाम साधु यक पाया ॥
तीनसौ वर्ष कीन तप जोई। जो कछु कहै सत्य सब होई ॥
बाद येशुपासे सो ठानी। तीनसौ वर्षकी तप विनसानी ॥
जब जहि जस चाहे तस करई। जीव जतन कछु काज न सरई ॥
किनको नाथ दीन बरदाना। निज भ्राता पर हो जय माना ॥
जीत्यौं प्रभु आज्ञा अनुसार। कोई न भा दोषी हत्यारा ॥
मूसा प्रभुकी आज्ञा पावो। चलि फिर उन भूप समुझावो ॥
देय यहूदिनको सो जाना। पुनि अस वचन कहौं भगवाना ॥
मैं फिर उनको करों कठोरा। मूसा वचनसे मुख सो मोरा ॥
फिर उनहिय प्रभुकरि कठिनाई। मूसाको तब कहा बसाई ॥
को अस बली जो ताहि उबारा। प्रभु जेहि आप डुबावन हारा ॥
जैसे प्रथम भन्यकी बानी। हसन हुसेन मृत्यु इमि जानी ॥
कीन हुसेन युक्ति बहु तेरी। पहुंचे मृत्यु महि मरनकी बेरी ॥
यकदिन अस कौतुक बतलाये। महम्मद द्वै किताब ले आये ॥
यक किताब दहने कर गहई। दूजी बाम हाथमें रहई ॥
दहने हाथ किताब जो दिखावा। नाम बिहिस्तिनकोतहँलिरकवा ॥
जो किताब बायें कर ग्राही। नारख नाम लिखा तामाही ॥
प्रथमहिंते भे स्वर्गी नकीं। कुदरतकी गति जाय न तकीं ॥
प्रभु केकइकी मनि हरि लीनो। रामचंद्रको सो बन दीनो ॥
केकइको कह दूषन दीजै। हरिइच्छा किन अटक कहीजै ॥
बाबुल बुर्ज बनावन लागे। सब नर तिय तेहि उद्यम पागे ॥
ताते नहीं ईश्वर सुखपाई। सबकी बोल दियौ पटलाई ॥
बरने बेद उपनिषद साखी। देव दनुज दोऊ दल रन भाखी ॥