कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
( ८१ )
ज्ञानीवचन
सो०—कहोधर्मसुन बात, विरल जीवमोहि चीन्हिहैं॥
शब्दनको पतियात, तुम अस कै जीवन ठगे ॥६१॥
कवीरवचन धर्मदासप्रति
अस कह मृत्युलोक पगु धारा । पुनि परमारथ शब्द पुकारा॥
छोड़यो लोक लोककी काया । नरकी देह धारि तब आया ॥
मृत्युलोकमें हम पगु धारा । जीवनसो सत शब्द पुकारा ॥
करुणामय तब नाम धराया । द्वापर युग जब महिमें आया॥
कोई न बूझे हैला मेरी । बांधे काल विषमभ्रम बेरी ॥
रानी इन्द्रमतीकी कथा
गढ़गिरिनारतबहि चलि आये । चंद्रविजय नृप तहां रहाये ॥
तेहि नृप गृहरह नारि सयानी । पूजै साधु महातम जानी ॥
चढ़ी अटारी वाट निहारे । संत दरश कहैं कायागारे ॥
रानी प्रीति बहुत हम जाना । तेहि मारग कहैं कीन्ह पयाना॥
मोहि पहुँ दृष्टि परी जब रानी । वृषली रसना कह यह बानी ॥
इन्द्रमती वचन
मारग बेगि जाहु तुम धाई । देखहु साधु आनु गहि पाई॥
दासीवचन
वृषली आय चरण लपटानी । नृप वनिता मुख भास सयानी ॥
कही वृषली रानि अस भाषा । तुम दर्शन कहैं अभिलाषा ॥
देहु दरश मोहि दीनदयाला । तुम्हरे दरश मिटे सब शाला॥
करुणामय वचन दासोप्रति
तब ज्ञानी कहि वचन सुनावें । राज रावघर हम नहिं जावें ॥
राज काज है मान बढ़ाई । हम साधू नृप गुह नहिं जाई॥
१ दासी लौड़ी