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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 208

( ८० )

अनुरागसागर

पुरुषवचन

ज्ञानी बेगि जाहु संसारा । यमसों जीवन करहु उबारा ॥
काल देत जीवन कहैं त्रासा । काटो जाय तिनहिको फाँसा ॥
कालहि मोटि जीव लै आवो । बार बारका जगहि सिधावो ॥

ज्ञानीवचन

तब हम कहा पुरुषसों बानी । आज्ञा करहु शब्द परवानी ॥

पुरुषवचन

कहा पुरुष सुनु योग संतायन । शब्द चिताय जीव मुक्तायन ॥
जो अब काल कीन्ह अन्याई । हो सुत तुम मम वचन नसाई ॥
अब तो परे जीव यह फन्दा । ज्युतहि आनु परम आनंदा ॥
काल चरित परगट है जाई । तब सब जीव चरण गहैं आई ॥
ज्ञान अज्ञान चीन्ह नहि जाई । देखहु भाव जिवनको भाई ॥
सहज भाव जग प्रगटहु जाई । जाय प्रगट है जिवन चिताई ॥
तोहि गहे सो जिव मुहि पैहै । तनु प्रतीत बिरले मय खेहै ॥
जाई करहु जीव कडिहारी । तो पर है परताप हमारी ॥
हमसो तुमहि अन्तर नाही । जिमितरंगजलमाहि समाहीं ॥
हमहि तुमहि जो दुइकर जाना । ता घट यम सब करिहै थाना ॥
जाहु बेगि वा तुम संसारा । जीवन खेह उतारहु पारा ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

चले ज्ञानी तब माथ नवायी । पुरुष आज्ञा जगमाहि सिधाई ॥
पुरुष अवाज चल्यो संसारा । चरण टेकु मम धर्म लवारा ॥

निरंजनवचन छन्द

तुहे धर्मराय अधीन है बहु भौंति विनती कीन्हेऊ
किहि कारणे अब जगसिधारेहु, माहि सोमति दीन्हेऊ
अस करहु जनिसब जग चितावहु इहै विनती मैं करौँ
तुमबंधु जेठे छोट मैं कर जोर तुम पायन परौँ ५८