कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( २००७ )
भिन्न भिन्न पूजा परकाशा । सकल जीव गल डारे फांसा ॥
रजगुण ब्रह्मा है संसारी । कर्मजाल जिन जक्त पसारी ॥
तमगुण रूप महादेव केरा । भवसागरमें ताको डेरा ॥
सतगुन मारग जो कोड धरई । भवसागरके पार उतरई ॥
द्रन्द खेल सतगुणमें बतें । ताहु भिन्नभाव बहु करते ॥
प्रथमहि विष्णु संप्रदा चारी । दुतिये सत्यपंथ आचारी ॥
वेद कि विधि पूरणता पावै । स्वसंवेद कह तब समुहावै ॥
जीवहि अवश्य कर्म सो करनो । सतगुणकी मारग पग धरनो ॥
सात प्रकार कहों पुनि धर्मा । भिन्न-भिन्न तिनको सुन भर्मा ॥
शक्ति निरंजन त्रिगुन है पांचो । वेद विदित शुभ धर्म है सांचो ॥
छठा धर्म कहिये शैतानी । जिनको गुरु इबलीस बखानी ॥
सप्तम धर्म कबीर कृपाला । जरतजक्त जिव जिन प्रतिपाला ॥
प्रथमें ब्रह्मा रजगुण कहिये । कर्मकांड सब ताते गहिये ॥
दुतिमें विष्णु उपासना हेता । तृतिये शंभु योग चित चेता ॥
चौथे ज्ञान निरञ्जन राया । पंचम शक्ति पसान्यौ माया ॥
तीन तीन विधि तिनमें आही । उत्तम मध्यम कनिष्ठ कहाही ॥
छठे धर्म इबलीसको जाई । तीन विभाग ताहुमें होई ॥ ॥
उत्तम कर्म करंता जोई । बुधि विद्या सागर है सोई ॥
कोड गुणगण कोड धनमद पूरे । कोड बाह विजयी है शूरे ॥
जो मद मान सहित हंकारा । मैं बड़ डोरहि तुच्छ विचारा ॥
मोरे योग गुरु कहूँ नाहीं । सो शैतानको पन्थ गहाहीं ॥
उत्तम कर्म जो करे करावै । मलिन कर्म लख दूर परावै ॥
ऐसे सुकर्म करे जो लोगा । ताते नर्क भोग नहि भोगा ॥
तिनको आवागौन न छूटे । योनी संकट पुनि पुनि जूटे ॥
दुतिये आपन उत्तम करनी । और सिखाये सुख कह बरनी ॥