कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २००६ )
बोधसागर
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सत्यपुरुषनकी बचन जो सुनिये । पुनि पुनि निज हृदयेमें गुनिये॥
करि बिचार गहिये सत सारा । जाते उतरे भवनिधि पारा ॥
इति
अथ धर्मव्योरा वर्णन-चौपाई
सब धर्मनको व्यौरा वर्णों । जेते धर्म कर्म संचरणो ॥
स्वसंवेद है सबकी आदी । ताते सकल मता मरजादी ॥
वेद अरु वानी जेते जगमहैं । स्वसंवेद है सकल पितामह ॥
ताते चार वेद प्रकटाने । आदि पिताकी खबर न जाने ॥
स्वसंवेद ते वेद बनाये । तामें ऋषि मुनि मता मिलाये ॥
यज्ञादिकमें हिंसा कर्मा । सो नहिं स्वसंवेदको धर्मा ॥
ऋषि मुनिनिज२शब्द जो मेला । ताते खिला और कछु खेला ॥
दोहा-पा कहिये त्रैदेवको, भाग कहावै खण्ड ।
ताते धर्म जो प्रकट भे, तासु नाम पाखण्ड ॥
चौपाई
षटदरशन सातवे पाखण्डा । धर्म कर्म पृथ्वी नौ खंडा ॥
सबही तीन वेदके अंशा । ऋषिमुनिसकल निरंजनवंशा ॥
स्वसंवेदते वेद भे चारी । ताते चार किताब निकारी ॥
स्वसंवेदते गह त्वच ज्ञाना । ताते सर्व शास्त्र बंधाना ॥
पञ्जः साम ऋग्वेद जो तीनी । तौरैत जम्बूर इक्षील कीनी ॥
अथर्वन वेदणे रचे कुराना । मता महम्मद सकल बखाना ॥
पीर नवी निज मता मिलाई । वेद विरुद्ध कर्म ठहराई ॥
यहि विधि भये विरोधी सारे । स्वसंवेद तजि पथगह न्यारे ॥
पांच तत्त्व गुण तीन कहाया । शक्ती और निरञ्जन राया ॥
इनहीकी पूजा जगमाहीं । परमपुरुष कोई जानत नाही ॥
शक्ति निरञ्जन छल बल कीने । परम पुरुषपद परदा दीने ॥