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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2081

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जीवधर्मबोध

( २००३ )

उत्तम मध्यम तिनमें कीने । जैसो कर्म जासु लखि लीने ॥
ब्राह्मण तिनमें तीन बडोरे । चतुरजी वणुजी मुकुरजी टेरे ॥
कायथ श्रेष्ठ कहे मुनि तीनी । घोस बोस मीतर कहि दीनी ॥
यहि विधि जात वरण ठहराई । असल नकल दोनों मिलजाई ॥
असल नकल मिल एक जो भैऊ । मान बड़ाई जिव सब गहेऊ ॥
जात वरनमें जिव अरुझाना । बिन श्रमसाधु सो बंधनभाना ॥
जिमि नृप जातिवरन बिलगाई । भांति भांतिकी रीति चलाई ॥
तिमि विदेव तिहुँपुरके राजा । कीने जकतकेर सब काजा ॥
पद्मदर्शन पांखंड बनाई । श्रुति स्मृतिमें जग अरुझाई ॥
कुल मरजाद थाप सो सारा । बंधनमाह बंधा संसारा ॥
जातिवरनके हृदमें जोई । संसारी कहलावै सोई ॥
पद्मदर्शनके हृदके माहीं । जातिवरनको बंधन नाहीं ॥
सो बेहृदके चालनहारे । साधु सो मुक्तिके मग पग धारे ॥
हृद बेहृद दोहू जिन त्यागा । गुरुलखि परमधर्ममें लागा ॥
जाति वरन सब मिथ्या होई । ताको साधु न माने कोई ॥
विप्र शूद्र कर्महि ते होई । उत्तम मध्यम कर्महि जोई ॥
गजते अचल मुनीश उपाये । केशपिंगल मुनि उल्लू जाये ॥
पुण्य अगस्त्य अगस्त्यउपाना । कौशिकमुनि कुशसे प्रकटाना ॥
कपिसे कपिल मुनीस उपाये । लता शाखगौतम ऋषि जाये ॥
दोनासे द्रोनाचार्य बखाना । ऋषि तीतरी तीतरसे माना ॥
रजसे परसराम प्रकटाये । शृंगी ऋषि हरनीके जाये ॥
कैवर्तिनसे व्यास कहाई । विश्वामित्र चंडालिन जाई ॥
ब्रह्मा आप कमलसे होई । सकल सृष्टिको करता जोई ॥
वेश्यासे वशिष्ठ मुनि भैऊ । इत्यादिकमुनि ब्राह्मण कहेऊ ॥
नहीं ब्राह्मणी इनकी माता । तऊ जकतमें द्विज बिरुयाता ॥