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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2080

( २००२ )

बोधसागर

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राजा पंडित मिसके दोई । वर्णाश्रम थापे सब सोई ॥
जिते जीव वर्णाश्रम बंधा । उत्तम विद्यासे सो अंधा ॥
उत्तम धर्म गहे नहीं पावै । वर्णाश्रम तिनको अटकावै ॥
लहै कबहुँ नहीं ज्ञान कि घाटी । जिनको वर्णाश्रमकी टाटी ॥
प्रथम जैन मते मैं भाषा । तीन वर्ण कुल करते राखा ॥
भरथने ब्राह्मण वर्ण थपाई । चार वर्णकुल यहि भांति कहाई ॥
चक्रवर्तिपद भरथ जो पायौ । दान देनको प्रजा बुलायौ ॥
प्रजा परीक्षाको मनलाया । बीच राहमें जल ढरकाया ॥
जलमय धरती हो जेहि ठाई । जीव असंख्य तहां प्रकटाई ॥
दान लेनको प्रजा जो चाले । दयावंत पथ गह्यो निराले ॥
जहां कीच तहँ पग नहीं दैऊ । भरथ भूप तेहि न्यारा कियऊ ॥
ब्रह्मचीन्हि जिन दाया पालो । कीच बीचमें सो नहीं चालो ॥
ब्राह्मण तिनको नाम उचारा । सबपर श्रेष्ठ धर्मसो धारा ॥
अजयपाल कनउजको राजा । रचे ताहिमें यज्ञ समाजा ॥
सातसौ वर्षके ऊपर भैऊ । लखब्राह्मण सो नेवति बोलैऊ ॥
येतो ब्राह्मण सो नहीं पाये । तब नरेश अस हुकम लगाये ॥
जो कोइ विप्र चिह्ने आवै । द्विजसम आदर दछिना पावै ॥
वर्ण विवेक न कीने राजा । जो आये तेहि यज्ञ समाजा ॥
भूप सबहि को द्विजकरि माना । विप्रतुल्य दे आदर दाना ॥
केते विप्र बने तेहि बेला । निज गल माह जनेऊ मेला ॥
नृप बुलाय सेनपति बंगाला । ताहूकी कहिये अस चाला ॥
कनउजसे द्विज पंच बोलाई । बंगालेमें सो चलिजाई ॥
ब्राह्मण पांच अरु कायथ पांचा । पहुँच जहां महीपति जांचा ॥
तिन्है प्रतिष्ठा दीन सो राजा । बस बंगाले सहित समाजा ॥
तिनको वंश पसारा कीना । भित्र भित्र पदवी सो लीना ॥