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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९९६ )

बोधसागर

८८

रमैनी

सतवां योग सहज है मीता । सहज भावसे यम से जीता ॥
एक विचार प्रेम उपजावै । पांचों इन्द्री सहज समावै ॥
निरलोभी है लोभ भुलावै । भवसागरमें बहुरि न आवै ॥
निस्संशीक होय जो कोई । संशय काल रहै नहिं कोई ॥
है निलैप कतहु नहिं लागे । सत्य शब्द गहि आतम जागे ॥

समौ-सब जग जूठा जानिके, सत्य नाम है सार ॥
सहजे सहज प्रकट भया, सतगुरु शब्द सँभार ॥

रमैनी

अठयौ योग शून्य है नीका । एकनाम आगे जग लागे फीका ॥
श्रुत्रहीते सब जग उपराजा । श्रुत्रहीते शब्द जो बाजा ॥
सहज श्रुत्र जो लावै कोई । अलखको लखै आपही सोई ॥
सहज शून्य जो ध्यान लगावै । भवजल तरत वार नहिं लावै ॥
सुरति शब्द ले सहज समावै । सहज समाधि परमपद पावै ॥

समौ-ज्ञानविचार विवेकते, शील संतोष समाय ।
नाम गहों निर्भय रहो, सत्यलोक सहजे जाय ॥

इति अष्टांग योगकी रमैनी

अथ ज्ञानपरीक्षा चार

निरालंब । निर्भर्म । निर्वासनिक । निरस्वादी ॥ १ ॥

विचारपरीक्षा चार

निरमोही । निरबंध । निःशंक । निर्वान ॥ २ ॥

विवेकपरीक्षा चार

सर्वगी । सावधान । सुचेत । सारग्राही ॥ ३ ॥

शीलपरीक्षा चार

शुची । संयमी । श्रोता । वक्ता ॥ ४ ॥