कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
(१९९५)
जाको समाधान मन होई। भली बुरी कहि जावै कोई ॥
समदरशी समज्ञान विचारे। सबघट भीतर ब्रह्म निहारे ॥
प्रीति गहे सो नाम समाना। और सकल जग मिथ्या जाना ॥
जाके शांति होइ घट नाही। कोइ कछु कहै कोध मन नाही ॥
रमैनी
चौथा योग शील कहि दीना। विना शील साहेब नहिं चीन्हा ॥
निर्मल सोचे सोचि विचारे। शुचि रुचि दया धर्म उर धारे ॥
मनको संयम करै जो ज्ञानी। पांचों पकरि एक घर आनी ॥
सत्य शब्द भावै संसारा। सत्यहिसे उतरे भवपारा ॥
होय औतारा सत्य बखाने। भावै बुरा भला कोइ माने ॥
समौ-शीलक्षमा जब ऊपजै, अलख दृष्टि जब होय।
विना शील पहुँचे नहीं, लाखो कथै जो कोय ॥
रमैनी
पच्वां योग सन्तोष बखानी। बिन संतोष बुझे अज्ञानी ॥
मानै नहीं रंक औ राजा। है अमान नहिं काहुते काजा ॥
नर्क स्वर्ग बाँछै नहिं कोई। होय अबच्छक साहेब सोई ॥
मन अस्थिर करि प्रेम उपजावै। अनहद शब्द सुने चितलावै ॥
समौ-निरमल शब्द प्रकाशकर, रह सुखसेज समय।
सत्य नाम सन्तोष बिन, सत्यलोक नहिं जाय ॥
रमैनी
छठै योग रहै निरवैरा। जाते जगते होय न वैरा ॥
सब घट भीतर एक करि जानी। होय सुदृष्टि परम परमानी ॥
सुख दाई सबहिनको भावै। जलस्वरूप है अग्नि बुझावै ॥
शीतल है सबहीको भावै। समता हो रमताको पावै ॥
समौ-कंचन काँचि है एकसम, दुष्ट मित्र सम एक।
दूजा भाव न जानहीं, एक नामकी टेक ॥