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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2067

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जीवधर्मबोध

( १९८९ )

तिमि तम उपादान कारनतन । राजसतामसनमित्तको कारन ॥
सातकसो समवाय बखानी । तीनों गुन करि देह उपानी ॥
सो तन कहे अन्नमय कोषा । बंधन ताहि चार है चोखा ॥
बसियौ रसियौ असियौ कसियौ । ये चारों बंधन तन लसियौ ॥
प्रथमें बसियो कहो बखानी । देहोहं यह तन मम मानी ॥
देहको सो आपा करि जानी । बंधन माह परा अज्ञानी ॥
दुनियौ रसियौ भेद उचारी । जेहि वर्णाश्रम जिव तनधारी ॥
सोइ वर्णाश्रम कर्म जो करिये । तेहि ते रसियौ बंधन परिये ॥
तृतिये असियौ कहिये ताही । निजु वर्णाश्रम जीव सराही ॥
तुच्छ इतर वर्णाश्रम देखे । बंधन असियौ गहे विशेषे ॥
चांथे कसियौ करे अकाजा । कुलकी लाज लोककी लाजा ॥
वेद अरु देव लाजामें फँसा । ताते परा जीवको संसा ॥
इन चारों बंधनको काटो । तब जिवकी अम संशय फाटो ॥
कुल अरु लोक वेद सुर लाजा । अस जब भाषे कुटुम समाजा ॥
हमरे कुलको यहि पथ डगरा । कुलकरनी तजि तू जस बिगरा ॥
तब जिव दुरि कुलधर्म सभारी । भित्रपंथ नहि सो पगधारी ॥
जो कोई यह लजा काटे । लोकलाज पुनि ताको डाटे ॥
लोग जो ऐसी बचन सुनायौ । बिगन्यौ श्रेष्ठ पुरुषको जायौ ॥
लोकलाज तब जिव नहि छोड़े । अपने कर्म ते सो मुख मोड़े ॥
लोक लाज जौ तोरके जाई । वेद लाज तेहि लेत फँसाई ॥
वेद लाज सो बंधन अहई । जब संसारी अस मिलि कहई ॥
काहू वेद शास्त्र परमाना । जो तू कर्म करे मनमाना ॥
वेदहु लाज लंघि जब जावै । देव लाज पुनि तोहि दबावै ॥
देव लाज कह कौन उलंघा । करे देव करनीमें भंगा ॥
इन्दी द्वारे देवन थाना । विषय भोग तिनके तन माना ॥