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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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(१९८८)

बोधसागर

८०

ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्य अण्ड आकारा ।
निहअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥
ज्योंग्विमध्ये किरन देखिये, किरनि ज्योति परकाशा ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीवब्रह्मसे श्वासा ॥
श्वासामध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं ।
पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यारा है वह साईं ॥
आपै बीज वृक्ष अंकुरी, आप पुहप फल छाया ।
सूर्य किरन परकाश आप है, आप ब्रह्म जिवमाया ॥
आतममें परमातम दरसै, परमातममें झाँई ।
झाँईमें यक झाँई दरसै, लखो कबीरा साईं ॥
छन्द-यह ज्ञान अगम अगाध कोई साधके मन भाय है ।
सो परख पारख परम गुरुकह परख पद परखाय है ॥
परखाय है सो परखपद जब दयानिधि हर्षाय है ।
सत्यनामके परताप पर्वल ताप त्रिविध नसाय है ॥

इति

अथ पंचकोष मिथ्यावर्णन—चौपाई

आप भूलि निजु फांसा लीना । पंचकोषमें बासा लीना ॥
पंचकोष यहि विधि पहिचानी । प्रथम अन्नमय कोष बखानी ॥
दुतिय प्राणमय कोष प्रमानो । तृतीय मनोमयकोषको जानो ॥
पुनि विज्ञान मय कोष अहई । फिरि अनंदमय पंचम कहई ॥
प्रथम अन्नमय कोष बखानो । अन्न भोगते ताथित मानो ॥
पंचतत्त्व परकृत पचीसा । तीनों गुन करि जिवतन दीसा ॥
जैसे घटको भाजन ठाटी । उपादान कारन है माटी ॥
तासु निमित्त कारन कोम्हारा । समवाय कारन चक्र विचारा ॥