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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९८० )

बोधसागर

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जबलों पारख पद नहिं पावै । तबलों आवागौन समावै ॥
ताते मनहिं विचार करीजै । कच्छी तत्त्वदेह किमि छीजै ॥
पक्की तत्त्व बहुरि जिहि पैये । कह संग्रह कह त्याग करैये ॥
पांचो तत्त्व पचीस प्रकृती । भर्म रूप सबही ये बर्ती ॥
जाग्रित स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । सो सब भर्म भावकी पुरिया ॥
जैसे जीव त्याग निज भूमी । चार खानिमै रहा सो झूमी ॥
ब्रह्मजीव जग दीसो माया । इत्यादिक बहु नाम धराया ॥
तैसे स्वसंवेद की बानी । धरि बहुरूप जक्त बिहरानी ॥

इति

अथ तत्त्वमसि तीनोंपद मिथ्यावर्णन-चौपाई

जान ज्ञान द्वैभेद बखाना । स्वसंवेद अस करे प्रमाना ॥
मलसंयुक्त ज्ञानको वरना । सर्वजीवमें सो संचरना ॥
ज्ञान अमल विकार कहावै । ज्ञानहि मात्र जीव बतलावै ॥
मेघ झंप जिमि भानु लोपाई । मुख न दीख दरपन लगिकाई ॥
तैसे जान भर्मकी ओटा । सत्य न भासै भासै खोटा ॥
पौन प्रसंग पटल घन बूरी । स्वतह भानु बहुडिस रह पूरी ॥
भानुउदय नहिं दरसै तारा । ज्ञानउदय नहिं यह संसारा ॥
अमल अखंड उदय दिनकरके । रहे न भर्मत तच्छन सरके ॥
जानति माया झंपन जबही । ज्ञान नाम कहिये सो तबही ॥
ज्ञानहि मात्र जीवको कहई । विना ज्ञान सब भूत्तक अहई ॥
जक्त मांह जेते वैपारी । जीव जमावै पार पसारी ॥
बिना जमावै पार न होई । खर्च कहांते करिहै कोई ॥

सत्यकबीर बचन

सारसी-कहै कबीर विचार, यह निर्णय परमान ।
जीव जमा जाने बिना, सबै खरचमें जान ॥