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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2057

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जीवधर्मबोध

( ११७१ )

पांच तत्त्वको जानन वारा । सदा सो इन पांचोंते न्यारा ॥
मन इन्द्री निरगुनते पारा । आप भूलि गल फन्दा डारा ॥

सोरठा-फन्दपरा जब जीव, अपनो रूपबिसारके ।
दृढन लागा पीव, विविधि प्रकारकी यतनकरि ॥

चौपाई

जिमि कपिकण्ठलगी जंजीरा । बँधा रहै बांसके तीरा ॥
कबहुंके बांस ऊपर चढ़ि आवै । कबहुंके हेठ उतरि सो आवै ॥
उतरा चढ़ि न छूटै ताकौ । दृढ़ जंजीर परी गल वाको ॥
तिमि जिव कमहीक्रम लहदेही । बिनसतगुरु पद पाव न येही ॥
जब जंजीर गलेकी छूटै । तब जिवरूप आपनो जूटै ॥
वपु विज्ञान शिखरकी चोटी । देही थूल मूल महि मोटी ॥
मूलते जब चोटी चढ़ि जावै । निज प्रतिबिंबै ध्यान लगावै ॥
ऊपर हेठ लख मोर स्वरूपा । झाँई भेद न जाने गुपा ॥
यही देहु विज्ञान कहावै । झाँई निरखि अपनको गावै ॥
जैसे तप्त तीख अंगारा । पर ताहीपर क्रमक्रम छारा ॥
ज्ञान अग्नि जब अन्त बुझाई । थूल शरीर बहुरि जिव पाई ॥
पुनि करि यत्न अग्नि उदगारा । तब विज्ञान देह सौ धारा ॥
होय जाय इमि कालहि पाई । आवागौन सूत्र नहि जाई ॥
जब कपि कंठ कड़ी गुरु छोरै । तब भ्रम धोखा होय न भोरै ॥
बन्धन सो विज्ञान कि देही । आवागौन न छूटै जेही ॥
इहां लगि वेद पुरान बखाना । आगे मरम न कोई जाना ॥
दशों दिशा दश सूरज होई । तब छाया नहि दूरसै कोई ॥
छाया माया होय विनाशा । जीवहि निजुस्वरूप तब भासा ॥
दशों दिशा जब रवि खरधारा । प्रलय होय तबही संसारा ॥
जहँ संसार तहाँ नहि ज्ञाना । जहाँ ज्ञान तहँ जक्त नसाना ॥