कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 2038, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १९६० )
बोधसागर
५२
कह कबीर सो सन्त है, आवागौ न नशाय ॥
कबीरगुरु मानुषकरि जानते, चरणामृतको पान ।
ते नर नरकहि जायँगे, जन्म जन्म हो श्वान ॥
कबीरते नर अन्ध हैं, गुरुको कहते और ।
हरि रूठे तो ठौर हैं, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥
कबीर गुरु है बड़े गोविन्दते, मनमें देख बिचार ।
हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥
कबीर गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीश दीजिये दान ।
केतिक भाँड़ पचिसुये, राखि जीव अभिमान ॥
कबीर तीन लोक नौरखंडमें, गुरुते बड़ा न कोय ।
करता करे न करि सकै, गुरु करे सो होय ॥
चौपाई
गुरुके लक्षण चार बखाना । प्रथमहि वेद शास्त्रको ज्ञाना ॥
पुनि हरि भक्त मनो क्रम बानी । तृतीये समदृष्टी कहि गानी ॥
चौथे वेदकी विधि सब कर्मा । यह चौ गुरुगुन जानो मर्मा ॥
मुख्य एक गुन गुरु कहि दीजै । चेलेको हरि सन्मुख कीजै ॥
गुरुको अर्थ अज्ञ तिमिराना । रू जाते प्रकटे हिय ज्ञाना ॥
दूर करे जो अज्ञ अघेरा । गुरु नाम ताही को टेरा ॥
ऐसहि शिष्य धर्म चौ भनते । गुरुकी सेवा तन मन धनते ॥
दुतिये सेव मैं विषयको त्यागे । तृतीये मन हंकार न जागे ॥
चौथे गुरुके वचन प्रतीती । जो कोइ गहै चलै यम जीती ॥
शिष्यको दोय धर्म सर्वोपर । गुरु सेवा वाती निश्चयकर ॥
जामें दोय धर्म ये बसि हैं । गुरु असीबते सब गुन लसिहैं ॥
आठ गुरु जो कीन प्रमाना । सबहि श्रेष्ठ अति उत्तम जाना ॥
सर्वोपरि दीक्षा गुरु भाषी । जाते भक्ति मुक्ति पद राखी ॥