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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 2037

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जीवधर्मबोध

( १९५९ )

धर्म महम्मदमें बतलाये । निश्चय तरुपर गुरु बैठाये ॥
निश्चय माह गुरुका बासा । बिन गुरु निर्गुण नर्कनिवासा ॥
निश्चयमें जब सदगुरु बैठे । जिवके हृदय ज्ञान तब पैठे ॥
जिनके हृदये निश्चय नाहीं । तो सबही निगरे नर आही ॥
द्रन्द्वते भया सकल संसारा । द्रन्द्वहि तासु छोड़ावन हारा ॥
पुरुष नारिको भया जो मेला । ताते जगको पसरा सेला ॥
तैसे जब गुरु शिष्य मिलजाई । सकल भर्म भय जाय नसाई ॥
बिन गुरु जीव राह नहीं पावै । जप तप दान बुथा सब जावै ॥
गुरुके बचन चरन चित दीजै । कबहू ताहि उलंघ न कीजै ॥
करिये गुरुकी सदा बड़ाई । गुरुअस्तुति सब अघ बिनसाई ॥
निशदिन ताहि सेवामें रहिये । ताते अधिक न तप कोह कहिये ॥
तन मग धन गुरु अर्पन करना । गोखुरसो भवसागर तरना ॥
गुरु निरुद्ध करिये जो कर्मा । होय शुद्धपै तजे अधर्मा ॥

सत्यकबीर बचन

साखी-कबीर गुरुबिन माला फेरत, गुरुबिन देते दान ।
गुरु बिन दाम हराम है, पूछो वेद पुरान ॥
गर्भयोगेश्वर गुरु बिना, लागा हरिकी सेव ।
कहै कबीर बैकुण्ठते, फेरि दियो शुक्रदेव ॥
कबीर गुरुबिन भर्मा, यौ फिरे ज्यों रामकोरोझ ।
सतगुरुसे परचै भई, पाया हरिको खोज ॥
कबीर जो निगुरा सुमिरन करे, दिनमें सौ सौ बार ।
नगर नायक सत करे, तौ जरे कौनके लार ॥
गुरु आज्ञा निरखत रहै, जैसे मणिहि भुअंग ।
कहै कबीर संसारमें, यह गुरु मुखको अंग ॥
गुरुकी आज्ञा आवई, गुरुकी आज्ञा जाय ।