कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
२२
मैं हो आदि मध्य अरु अन्ता । मोहि फुराफुर वेद बदन्ता ॥
पक्की तत्त्व देह जब पावै । तबनिजुघरजिव बहुरिके आवै ॥
पक्की तत्त्व प्रकृत पच्चीसा । स्वसंवेदकी विधि जो दीसा ॥
ताको गह कच्चीको त्यागे । ऐसे योग युक्तिमें लागे ॥
तनकी कृपा योग अष्टंगा । ताको तज भज मनको अंगा ॥
मन अष्टांग योग उरधारो । स्वसंवेद जाको निरधारो ॥
तनकी कृपाकाज नहीं सरही । मन करनी जिवपार उतरही ॥
मनको रचित सकल संसारा । हो निवृत्त जिव मनके द्वारा ॥
तन मन यद्यपि मिथ्या दोई । मन करनी अति उत्तम होई ॥
तन है जाय आपनी बसमें । जेहि औसरआवै मन कसमें ॥
तन मन दोनों बश है जाई । तब निज रूप नजरमें आई ॥
ऐसे साधु जो जगमें आही । हरि ब्रह्म शिव ध्यावै ताही ॥
ताकी गतिको सके बखानी । लखे न शारद वेद अरु बानी ॥
मौनीजि वचन विचार माला
दोहा—स्वसंवेद नहीं कहि सके, लक्षण सन्त महन्त ।
परसंवेद कहे कष्ट, संग प्रताप कहंत ॥
चौपाई
जिनकी गति अगम अगाधू । बानी वेद पारसो साधू ॥
स्वसंवेद गुण तासु न कहई । तिनको भेद जीव किमि लहई ॥
समदृष्टि सो साधू ऐसे । सोई ब्रह्म रूप मैं पैसे ॥
काहू नहीं सो दुःख दुःखावै । जिनकी दृष्टिमें साहेब आवै ॥
को हिन्दू को मुसलमाना । को ब्रह्म केहि श्रद्ध बखाना ॥
कौन यहूदी कौन नसारा । एकै ब्रह्मको सकल पसारा ॥
रह्यौ चराचरमें सो पूरी । जाहि लखे हो सब दुःख दूरी ॥
आप आप लख ब्रह्म सनेही । जहाँ तहाँ देखो नेरी देही ॥