सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2007, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2007

२१

जीवधर्मबोध

( ११२९ )

तेहि सर्वथा अभाव जो कीजै । तब कैसे निज देह धरिजै ॥
पै अभाव कीजै गुरु द्वारे । तब जिव अपनो काज सँवारे ॥
पुत्र अकाशको बायू होऊ । पिता समान शून्य है सोऊ ॥
बायू बेटा अग्नि बखानी । सो तद्रूप तातके जानी ॥
तासुत जल जलते यह धरनी । ये सब सन्न एक सम उरनी ॥
शून्य अकाश शून्य तिहु गुन है । तम अरु अहंकार सब सुन है ॥
पुत्र पिता परपिता सहीते । सर्व सुन कहु सार न चीते ॥
शून्यको रचित देह यह अहई । शून्य सर्वथा ताको कहई ॥
शून्यकि कृपा सूत्र सब जानो । शून्य सर्वसंसारहि मानो ॥
तन मन धन सब शून्य बताओ । नाम रूप गुन शून्य कहाओ ॥
सो तन मन धन गुरुको दीना । नाम तासु बदले गहि लीना ॥
शून्य जो दीना शून्यहि लीना । कहो कहा कारज निज कीना ॥
शून्यहि दीन जो सूत्रहि पाया । तेहि व्योहार हाथ क्या आया ॥
है परंतु कारण तह एका । तामैं लहो भिन्न कछु लेखा ॥
निश्चय नामहु शून्य विचारी । तामैं है कारज यक भारी ॥
नाम डोरि हटु गहि जो कोई । शून्य पार पथ पावै सोई ॥
शून्यकि पारपंथ जब पावत । बहुरि शून्यमें सो नहि आवत ॥
शून्य रूप भवसागर धारा । अंड पिंड सब शून्य सँवारा ॥
अमकरि शून्यमें खल प्रकाशो । जस मृगजल मरुथलमें भासे ॥
फेन बुदबुदा वारि तरंगा । वायु प्रसंग बनावहु ढंगा ॥
जेहि औसर वायू नहि चलही । गलके सकल मिले तोह जलही ॥
जल विकार सब जलहै जैसे । माया ब्रह्म जीव यक तैसे ॥
अम करि नाम धरे बहु डोरा । एकब्रह्म तजि कतहु न औरा ॥
जेहि औसर जिव सोलखि पावै । एकै माह अनेक समावै ॥
दृश्य अनेक जो एक समई । पिंड अंडकी थाह सो पाई ॥
थाह पाय जब जीव थिरोना । तब जान्यौ हो चारु चिरोना ॥

नं. ११ बोधसागर - ६