कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९२३ )
चौपाई
कोई है पती पयोधर पकरे । कोई बनि पुत्र ताहिंते टकरे ॥
भरता पुत्र होय नहिं दोऊ । सत्य कबीरते और न कोऊ ॥
नारिके बसमें सब संसारी । रचना तिहु पुरमाह पसारी ॥
भवसागर भगसागर जानी । भवके करता भव रु भवानी ॥
तीनों पुरको ईश कहाया । जिन भगचौरके राह बनाया ॥
भगके रुधिरते भगवा भेषा । देव निरंजन अकथ अलेपा ॥
उज्ज्वल भेष पुरुषको बाना । भगवा भेष निरंजन राना ॥
अंग पिंड भग माह समाना । सत्य कबीर बचन परमाना ॥
अंतर ज्योति शब्द यक नारी । हरि ब्रह्मा ताके त्रिपुरारी ॥
ताहि तियहि भग लिंग अनंता । तेउ न जाने आदिवो अंता ॥
लिंग रूप यक शंकर कीना । धरती खिला रसातल दीना ॥
भा बालक भग द्वारे आया । भग भोगनको पुरुष कहाया ॥
अबला सम कहुँ बली न कोई । तीन लोक ताकी बस होई ॥
अष्ट प्रकारके मैथुन अहई । ताते न्यारा कोह न रहई ॥
दोहा-श्रौतो सुमिरन कीर्तनो, चितवन बात यकंत ।
हठसंकल्पो रत्न पुनि, प्रापति अष्ट कहंत ॥
चौपाई
मिथुन विकार जीव सब पागा । जरे तीन पुर तिय अनुरागा ॥
जेती जगमें कथा किहानी । नारिप्रताप सकल से जानी ॥
जबलों रहैं देहको खेला । तबलों हो नारी सँग मेला ॥
नारि परे जो जाना चहई । ताकी देह तहां नहि रहई ॥
भग भोगै अरु भक्त कहावै । फिर फिर भगभोगनको आवै ॥
जड़ चेतन दोउ नारि स्वरूपा । कनक कामिनी जिव भ्रमरूपा ॥
विषकी बेल दोहूको जानी । लगे ताहिमें जिव अज्ञानी ॥