कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 2000, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १९२२ )
बोधसागर
१४
ताको गुन यह प्रकट देखावो । आवा गौनको लेख लगावो ॥
प्रथमहि दृष्टि दौरि जब जोई । नारि देखि केहि यह हरषाई ॥
जब नर ताहि निकट नियराया । कुचनके ऊपर हाथ चलाया ॥
कुचनको जब निजु करते परसा । अधिक मोद मनमें तब सरसा ॥
कुच नहिं भोजन पात्र पयोधर । अधिक प्रीति मानुष ताते कर ॥
प्रथमहि भोजन पात्र टटोले । आवागौन राह पुनि खोले ॥
तिहि मारगमें जब जिव धसेऊ । पुत्र होय पुनि बाहर खसेऊ ॥
भर्ता है तिहि मारग पैठा । पुत्र होय पुनि बाहर पैठा ॥
भोजन पात्र टटोल जो पहिले । बालक है भाजन सोह गहिले ॥
भोजन भाजन भायां माता । पुरुष पुत्र एकै द्वै बाता ॥
भीतर बाहर पैठे निकलेरे । आवा गौन आपनो सकरे ॥
मनते मनमथ भयौ प्रचंडा । महाकाल सत सो बरिबंडा ॥
पांचवान सो निज कर लीने । सकल जीव अपने बस कीने ॥
दोहा-मोहन मारन बसकरन, उच्चाटन उनमाद ।
पांच बान ये काम गह, तिहु पुर परा विषाद ॥
भवसागरमें आयके, कोइ न भयौ समरत्थ ।
यक कंचन यक कुचनपर, को न पसारचौ हत्थ ॥
कुंडलिया
भवसागरमें आनिके, भै कबीर समरत्थ ।
कंचन कुचन दोहूनपै, सो न पसारचौ हत्थ ॥
सो न पसारचौ हत्थ, आप कमला चलि आई ।
चित चंचलावनहित, कीन सो विविध उपाई ॥
कीनेसि विविध उपाय, कबीरको मन किमिहाली ।
है निरास श्री तास, बहुरि बैकुंठहि चाली ॥