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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1996

( १९१८ )

बोधसागर

१०

चिउँटी रूप होय हंकारी । तिनहि लताडे सब नर नारी ॥
हशरगाह ते जब सो चाले । हबहब कूप नरकमें डाले ॥
हजरत सुलेमानकी बानी । बूथा सकल तप हो अभिमानी ॥
राई भरि जामें हंकारा । सो विहिंशतको नहिं पग धारा ॥
पुनि रसूल मकबूल बतावे । होय दीन बड़ि पदवी पावे ॥
ऐसो नर जगमें नहिं कोई । जाके शिर लगाम नहिं दोई ॥
गहे लगाम सो दोय फिरिशते । जगजिव तिनहि दीन हो दिस्ते ॥
तब दोउ प्रभुसे विनय उचरना । हे प्रभु याको ऊँचा करना ॥
धरि लगाम तेहि ऊँचा करही । जगमें श्रेष्ठ नाम तब परही ॥
जब जिव ऊँचा शीश उठावै । दोऊ फिरिशते विनय सुनावै ॥
हे प्रभु याको कीजै नीचा । धरि लगाम नीचेको खींचा ॥
अभिमानिनके शिरमें पौना । ताकौ चित्त फलावै तौना ॥
सोई पौन हंकार कहावै । बुरी चाल सब ताते आवै ॥
पढ़ि विद्या जगको भरमावै । आप न शुभकरनी मनलावै ॥
विद्याके अनुसार न करनी । अन्तमें तिनकी यह गति बरनी ॥
नरकमाह प्रभु तिनहै पठै हैं । औरनते दशगुन दुःख पैहैं ॥
गरदन पीठ तासु टुटि जाई । नरकमाह अतिशय दुख पाई ॥
जिमि खर चक्की को भरमावै । तैसे यम ताहि नाच नचावै ॥

दोहा—अग्नि कतरनी करगहे, कतरे तिनको ओठ ।

नरकमाह बड़ दुख भरे, विद्या पढ़िभे खोट ॥

चौपाई

अभिमानिनकी कथा बखानी । ईश्वरको बैरी तेहि जानी ॥
सकल बड़ाई प्रभुको सोहै । और बड़ा जगमें कहु कोहै ॥
जिनके हृदयमें हंकारा । तिनको कोई करे नहिं प्यारा ॥
नृप फिर ऊन महाअभिमानी । आपको जो ईश्वर करि जानी ॥