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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1995

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जीवधर्मबोध

( १९१७ )

जो कोई कह मैं बड़ा कुलीना । सबसे ताको जाय मलीना ॥
जो कोइ कह मैं हौं बड़ सुन्दर । महाकुरुप सो होय छछूंदर ॥
जो कोइ कह मैं उत्तम जाती । सो बैठे कुकुरनकी पाती ॥
जो कोइ कह मैं पंडित ज्ञानी । होय निरक्षर पुरुष प्रानी ॥
जो कोइ कह मैं बड़ गुनवन्ता । होय सोय विद्याको जन्ता ॥
जो कोइ कह मैं बड़ बलवाना । होय अबल सो कीटसमाना ॥
जाति पांति कुलके अभिमानी । भ्रमत फिरै चौरासी खानी ॥
अभिमानिनकी कहो कहानी । धर्म महम्मद यथा बखानी ॥
त्रिविध तकबुर निर्णय ठानी । प्रथमजो भये ऐसे अभिमानी ॥
जस नमरूद आदि फिर उन्ता । नृप मद आपको ईश्वर गुन्ता ॥
प्रथम तकबुर प्रभुके ऊपर । नबीपै बहुरि तकबुर दूसर ॥
तृतीय तकबुर जग लोगनपै । मैं गड तुच्छ और सब जनहैं ॥
हौं बड़ श्रेष्ठ गुनन मलसही । औरनमें यह गुन कह बस ही ॥
प्रथम कहौं विद्या अभिमानी । दुतिये तपसीतपजिन ठानी ॥
विद्याके अभिमानी जोई । तिनके मत विचार अस होई ॥
हमही मनुष और सब पशु गन । जिनके हृदय न विद्याको धन ॥
विद्या धन सर्वापर गाई । ताते हम ईश्वर लखि पाई ॥
जगमें हम सबके शिर ताजा । हमरे हाथ है काज अकाजा ॥
दुतिये तपसिन केर समाजा । बिना मान नहीं कोई ऋषिराजा ॥
सो ऐसो निज मनहि विचारी । दरश हमार जक्त हितकारी ॥
आपको सुक्त युक्त लख औरा । और तुच्छ हम सब शिरमौरा ॥
ये दोनों पदको मद भारी । रूप गर्व धारत है नारी ॥
धनअभिमानी पुनि अस बोला । मैं चाहों औरहि लेव मोला ॥
बलमदकुलमदकुटुंबअरुचाकर । शिखशाखा बहु मानधरे नर ॥
अभिमानिनकी दशा बखाना । हशरगाह जो न्याय स्थाना ॥