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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1985

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गुरुभाहान्त्य

( १९०७ )

गुरु करे हिय दया त्यागे, मामा चिता व्याकुल अहे ।
अमर शोभा देख वे गुन, हर्ष जीवन अति अहे ॥

सोरठा-अब जिन लावहु बेर, ठाढ़े सकल अकुलावहीं ।
प्रभु दयावंत जो होइकै, वे पुरुष दर्श करावहीं ॥

राजाका मोहबचन-चौपाई

राजा रानी कुँवर पचासा । सकल जीव विनती परकाशा ॥
बेग लये चलो हंस पति राजा । वह विनती करे सकल समाजा ॥
चातक स्वाति रटत जिमि जैसे । तृषावंत सबरे जिव तैसे ॥

सुकृत वचन

सत्य सुकृतमें सुरति समानी । होय निशंक करो रजधानी ॥
पुरुष नाम राजाकहँ दीना । संग लोग हंसन सब लीन्हा ॥
राय मोह हम लोक चलि जाई । सत्तर सहस्र हंस सँग लाई ॥
ऐसे सुमति करो जो बंदा । कालत्रास नहीं हो दुखद्वंदा ॥
एकचित होय सुरति जेहि लाग। सत्य शब्द सो तन मन पागा ॥
देखि काल दूरहिते भागे । जो पदपुरुष नाम दृढ़ लागे ॥
राय गए जहाँ हंस समाजा । आए हंस आरती साजा ॥
गावहि मंगल करहि कुलाहल । षोडश शृंगारा अंग भल ॥

राजाका मोह वचन

राजा देखि चकित मन पागा । बार बार सुकृत पद लागा ॥
देखेउ लोक वरन अतिपावन । अब हमपाये निज मनभावन ॥

सुकृत वचन

सुकृतहि चले राय ले साथ। जाय पुरुष कहु नायउ माथा ॥
छंद-दर्श पाय नित जीव वे सब, रूप भयो परकाश हो ।
अमिय फल जब पाये हंसा, द्रीय द्रीय विलास हो ॥