कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
१६
बालक तिया बृद्ध सब आए । सो साहबके पद लपटाए ॥
पुरुष अंक दीन्हेउ मति आगर । पाय पान भये हंस उजागर ॥
स्मृतकहाथ दीन्ह जिव सबही । जाते यम नहिं रोके कबही ॥
पाय पान तब भए सनाथा । सकल जीव तब नाये माथा ॥
राजाका मोहवचन-छन्द
जिमि घन नभमें शशि अवलोकत सिद्ध होत उमंगही ॥
शब्द नभ गुरुचरण इमि निशि कर्म सूरत तरंगही ॥
तिमि हर्षे राजा सकल जिव मिला करत कोलाहल सोहही ॥
बृद्ध हंसन यूथ ठाढे निरखि सुकृतहि मोहहीं ॥
सोरठा-अब दीन्हा निज पान, अधम जीव अपने किये ॥
विनय एक अनुमान, देश आपने ले चली ॥
चौपाई
यह भवसागर अति अवगाहा । सुर नर देव पाए नहिं पाहा ॥
दर्शन आय दीन्ह तुम जाही । आपनकर राखे गहि ताही ॥
निशदिन यमहीफंद लगावत । शब्दहित्यागि विषयमन ध्यावत ॥
पलपल काल करत है घाता । शब्द तुम्हारा श्रुति नहिं राता ॥
ताते विनय करें बहुबारा । सकल जीव हैं शरण तुमारा ॥
एकहि सुरत सकल जिव केरा । अब जनि साहेब लावहु बेरा ॥
बेगि लै चलो वाही देशा । अमरपुरी जहाँ हंस नरेशा ॥
अबजनि मोहिराखहु भवसागर । ले चलो जहवां हंस उजागर ॥
दीनबधु प्रभु कीजे दाय। सकल हंस ले लोक सिधाय। ॥
भेटे चरण पुरुषके जाई । अब भव चिर नाही ठहराई ॥
सकल हंस वचन-छन्द
जीव चढ़ावें करत करूणा सुनहु नरपति नागरा ।
करहु सदगुरु विनय दृढ़ होय, नहिं रहब भवसागरा ॥