सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1978, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1978

( १९०० )

बोधसागर

१०

साधुरूप हमही कर लीन्ह। रायसंग तत्क्षण पग दीन्ह। ॥
गये नृप जहवाँ प्रीतम विराजा। भांति भांतिकर बाजन बाजा ॥
कछुक द्रव्य ले आगे राधा। विनय दंडवत बहुविध भाषा ॥
होत कुलाहल मंगल चारी। भांति भांति गावे नर नारी ॥
बन्नीपरश रायकर आसन। बैठ नृपति जाय सिंहासन ॥
हम जीवन सौश्रव्य पुकारा। धार धार फिरे सेवनके धारा ॥
चेतहु प्राना शब्द सँदेश। चलो जहां तहां हंस नरेशा ॥
तहवाँ जाय बहुरि नहिं आवे। एक चित होय नाम लोलावे ॥
सकल जीवसे कहेउ चेताई। एको जीव नहिं पतिआई ॥
सात दिवस रायहि तब बीता। कौतुक एक तहां हम कीता ॥

छंद-गयउ मंडपपास तत्क्षण जहां बन्नीनाथ हो।
रूप पाहन कीन्ह पारस दिनेहु मस्तक हाथ हो ॥
बीति निशि भिनसार भो तब जाय पंडा पूजही।
करत आरति भयउ चक्रित देखादे जावे तब बूझही ॥
सोरठा-आरत आहेक घात, प्रतिमापद कंचन भयो।
कहत सकल सो बात, राजारामदास जाय जनायो ॥

चौपाई

राजा सुनत हर्षि चित दीन्हौ। प्रभु मायाको जानन लीन्हौ ॥
भयो अचम्भो लोगन सबही। लीला आप कीन्ह प्रभु अबही ॥
स्तुति करत बहुत हर्षाहीं। सत्य भेष कोइ चीन्हत नाहीं ॥
राजा दिल करे सब साधू। चले संत जुथ जुथ मतबाधू ॥
राजा झारी लीन्हे हाथा। सकल भेद कह नावहि माथा ॥
रानी साधुन चरण परवारा। राजा आपन कर जल ठारा ॥
सकल भेष कहे बैठे जेवनारा। जय जय मंगल होत उचारा ॥
तब हम ताहां बैठे जाई। पूर्ण शशी सम रूप दिखाई ॥