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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1977

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गुरुमाहात्म्य

( १८९९ )

युग बंधन पाये जो पाना । हंस होय सत्यलोक समाना ॥
दृढ प्रतीत होइ करे गुरुसेवा । भक्तिहीन गुरु पावन देवा ॥
साखी-दीन्ह नील जेहे नानहुँ, भक्तिभाव अनुराग ।
निश दिन गुरु चरण गहे, हंस होवे बड़भाग ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कहे हंसन पति राजा । भलविध कीन्ह हंसको काजा ॥
तुमहि पुरुष हो तुमही ज्ञानी । तुमहीं वंश रूप हम जानी ॥
पुरुष रूप तुम उत्पन्न कीन्हा । वंश रूप जग तारण लीन्हा ॥
सतयुग कौन जीव जग रेहू । केहि विध हंसन आन उबारेहू ॥
कौन नग्र कहवा तुम गयऊ । केतिक जीव शरण तुम भयऊ ॥
कैसे सेवा कीन्ह बनाई । हिये दलक होकै समुझाई ॥

सतगुरु वचन

पुरुष अवाज आये भव सागर । सत्य सुकृत हम नाम उजागर ॥
उत्तर दिशा गयउ निज ठामा । श्रीनग्रे पहुँचेउ तब ग्रामा ॥
राय मोहम तहाँके राजा । भक्त करत भेटत कुल लाजा ॥
सुन्दर बदन रूप अधिकार्ई । परजा सुखी राजसुख पाई ॥
शुचि संयमआत्मज्ञान उजागर । दीन लीन्ह संतन सो आगर ॥
करत खोज साधू सो प्रीती । अति आनंदरूप सुखरीती ॥
भांति भांतिके मंडप छावा । साधु संत आदरके लावा ॥
करे महोत्सव साधु बोलाई । प्रेम पुरुष निशदिन मनभाई ॥
निश दिन वेद कथासों प्रीती । कौन भांति जिव यमसों जीती ॥

साखी-खोज करत चित व्याकुल, दृढत सगलो भेष ।

सिरजनहार बतावई, सबही कहत अलेष ॥

चौपाई

चले राय तहाँ बद्दीनाथा । सुत सुमित्र लिये रानी साथ ॥