कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसुमिरनबोध
( ३९ )
गुरु कृपा ते जनक विदेही । सो गुरु माहि परमपद लेही ॥
गुरु कृपा ते जन प्रहलादा । दैत्य होइ भक्ति तिन साधा ॥
गुरु कृपा जो कोई पावै । सकलो दुरमति दूर बहावै ॥
साखी-गुरु कृपा ऐसी अहै, सुनो साधु चित देइ ।
ताते गुरु सुमिरण कहू, रहे कालको लेइ ॥
गुरु गुरु जाप करो मन मेरा । काल दूत नहि आवै नेरा ॥
गुरुको ध्यान धरों नर नारी । सहजे सहज तरो संसारी ॥
गुरु गुरु सुमिरो मनसे प्यारो । गुरु गुरु कहो कोटि अवतारो ॥
गुरु गुरु जाप काज सबसारे । दुर्मति कपट दूर करि तारे ॥
गुरु गुरु जाप करो मन धीरा । गुरुके नाम मिटै सब पीरा ॥
गुरु गुरु मंत्र हृदय धरीजै । तन मन धन सब अर्पण कीजै ॥
गुरुको सुमिरन निशदिन कीजै । जीवन जन्म सफल करि लीजै ॥
एक नाम गुरु देत दिखाई । सो निजनाम कलपि नहि जाई ॥
गुरु सुमिरण निज नाम विचारे । आप तरे औरनको तारे ॥
सतगुरु शब्द नाम निरधारा । भव सागरसे उतरे पारा ॥
साखी-गुरुको सुमिरण कीजिये, निशदिन ध्यान लगाय ।
गुरु लक्षण अब कहत हो, सुनहु धीर चित लाय ॥
राग द्वेष दोनों से न्यारे । ऐसा गुरु शिष्यको तारे ॥
आशा तृष्णा कुबुद्धि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥
निरालम्ब भ्रम रहित उदासी । निर्विकार जानो निर्वासी ॥
निरमोही निरबंध निशंका । सावधान निरवान निबंका ॥
सार याही और सरवज्ञी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥
अयाचक जन निर अभिमानी । पक्षरहित अस्थिर शुद्धवानी ॥
निस्तरंग बाही परंपंचा । निष्कर्म निरलिप्त अबंचा ॥
बोल अडोल भाखे सो सांची । कोई बात कहै नहि कांची ॥