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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1844

( ३८ )

बोधसागर

गुरुसीढी चढि ऊपर जाई । सुख सागरमें रहे समाई ॥
गौरी शंकर और गणेशा । उनहू लीना गुरु उपदेशा ॥
गुरुमुख सदाअटल अविनाशी । सुर नर मुनिसबध्यानधरासी ॥
गुरुमुख सब भक्त औ दासा । गुरुमहिमा उन्हीसे प्रकाशा ॥

साखी-गुरुमुख को सबही मिलै, चार पदार्थ सार ।

निगुरा को तो कुछ नहीं, वहे सो नरकहि धार ॥

गुरु विनु मुक्ति ना पावै भाई । नर्क ऊर्द्ध सुख वासा पाई ॥
गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । गुरु विनु रहीयमलोकसिधाना ॥
गुरु विनु पढे जो वेद पुराना । ताको नाहि मिलै सतज्ञाना ॥
गुरु विनु जो सो पशू कहावै । मातृ व बुधि दुर्लभ होय जावै ॥
गुरु विनु दान पुण्य जो करई । होय निष्फल सब मतसोकहई ॥
गुरु विनु भ्रम ना छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ॥
गुरु विनु होम यज्ञ जो करई । जाय पुण्य पाप सो भरई ॥
भवसागर है अगम आगहा । गुरु विनु कैसे पावै थाहा ॥
गुरु विनु बूझे सकल अचारी । तैतीस कोटि देव सब धारी ॥
गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके बासी ॥

साखी-गुरु आज्ञा ग्रहणकरि, छोडे मनसुखताकाल ।

गुरु कृपा तब पावई, क्षणमें होय निहाल ॥

गुरुकी कृपा कटै यम फांसी । विलम्ब न होय मिलै अविनाशी ॥
गुरु कृपा शुक्रदेवहि पड़या । चढि विमान वैकुण्ठहि गइया ॥
गुरुकी कृपा जब नारद पयऊ । मेटि चौरासी सुखी सो भयऊ ॥
गुरुकी कृपा रामपर सोहै । जीवन मुक्ति पाई जग मोहै ॥
गुरु कृपा बामदेवहि दइया । गर्भ माहिं गुरुज्ञानहि पड़या ॥
गुरु कृपा ध्रुव जो दरसा । अटल अमान परमपदपरसा ॥
गुरु कृपा ते भये उजासी । सनक सनन्दन नारद व्यासी ॥