कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअनुरागसागर
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छन्द
जनमजनमको मैल छूटे, पुरुष शब्द जो पावई ॥
नाम भा सुमिरण गहे सो, जीव लोक सिधायई ॥
गुरुशब्द निश्चय दृढगहेसो, जीव अमियअमोलहो
सतनामबल निज घर चले, करे हंसकलोलहो ॥२८॥
सोरठा-सत्यनामपरताप, काल न रोके जीवकहैं ॥
देखिवंशको छाप, काल रहै सिर नायके ॥ ४० ॥
चौरासी धार क्यों बनी ? धर्मदासवचन
चारि खानिके बूझेउ भाऊ । अब बूझों सो मोहि बताऊ ॥
चौरासी योनिनकी धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥
नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोह और जीव भुगताई ॥
है साहिब जनि मोहि दुराओ । कीजे कृपाबिलंबजनिलाओ ॥
मनुष्यके लिये चौरासी बनी है सदगुरुवचन
धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समाई ॥
सो तनु पाय आप जहैं जावे । सतगुरुभक्ति विनादुख पावे ॥
नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़मतिनाशी ॥
चौरासीकी चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥
लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहां कछु नाहीं ॥
पुनिपुनि दौड़ि कालमुखजाहीं । ताहूते जिव चेतत नाहीं ॥
बहुत भांतिते कहि समुझावा । जीवत विपति जान गुहरावा ॥
यह तनु पाय गये सतनामा । नामप्रताप लहे निजधामा ॥
छन्द
आदिनाम विदेह अस्थिर, परखि जो जियरा गहे ॥
पाय बीरा सार सुमिरण, गुरु कृपा मारग लहे ॥