कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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अनुरागसागर
एक एक बिलोय धर्मनि, कह्यो सत मैं तोहिसों ॥
चारखानी लक्ष भाषेउँ, सुनो आगे मोहिसों ॥३८॥
मनुष्य शरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख
सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरे फिर आयके ॥
ताका कहौ सँदेह, धर्मदास सुनु कानदे ॥३९॥
धर्मदासवचन
हे स्वामी इक संशय आयी । सो पुनि मोहि कहो समझाई ॥
चौरासी योनिन भरमावे । तब मानुष की देही पावे ॥
यह विधि मोसन कह्यो बुझायी । अब कैसे यह संधि लखायी ॥
सो चरित्र गुरु मोहि लखाऊ । धर्मदास गहि ठके पाऊ ॥
मानुष जन्म धरे पुनि आयी । लक्षण तासु कहो समझायी ॥
कबीरवचन
धर्मदास तुम भलिविधि जानो । होय चरित सो भले बखानो ॥
आयु रहते भी मृत्यु होती है
आइ अछत जो नर मर जायी । जन्म धरे मानुषको आई ॥
जो पुनि मूरख ना पतियाई । दीपक बाती देख जराई ॥
बहुविधि तेल भरे पुनि ताही । लगै वायु तबै बुझ जाही ॥
अग्नि लायके ताहि लेसावे । यहिविधि जीवहु देह धरावे ॥
ताको लक्षण सुनहु सुजाना । तुमसों न गौय राखै ज्ञाना ॥
शूरा होवे नरके माहीं । भयउ डरताके निकट जाहीं ॥
माया मोह ममता नहि व्यापे । दुश्मन ताहि देखि डरकाँपे ॥
सत्य शब्द प्रतीति कर माने । निन्दा रूप न कबही जाने ॥
सतगुरु चरण सदा चितराखे । प्रेम प्रीतिसो दीनता भाखे ॥
ज्ञान अज्ञान होइ कहैं बूझे । सत्यनाम परिचय नित सूझे ॥
जो मानुष अस लक्षण होई । धर्मदास लिखि राखो सोई ॥