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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1796

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बोधसागर

अथ दो प्रकारकी समाधि वर्णन--चौपाई

दोय प्रकार समाधि कहीजै । सविकल्पो निर्विलप गनीजै ॥
जो सविकल्प समाधि कहावै । ज्ञाता ज्ञान ज्ञेययुत ध्यावै ॥
त्रिपुटी भान सहित जब सोई । ब्रह्म बीच वृत्ती लय होई ॥
सा सविकल्प समाधि कहावे । निर्विकल्पको अब कहि गावे ॥
त्रिपुटी भानु रहित वृत्ती जब । ब्रह्मानन्द हो निर्विकल्प तब ॥
जो सब कल्पको साधना जाने । निर्विकल्प फल तासु बखाने ॥
निर्विकल्प सूखो पति दोई । यतनो भेद दोहूमें होई ॥
निर्विकल्पमें ब्रह्मा नन्दा । सुषुप्तितमें अज्ञानको फन्दा ॥
निर्विकल्पमें चार हैं बाधक । तिहि सचेत रह चातुरसाधक ॥
प्रथमै लय विशेष बहोरी । पुनिकर अरशा स्वाद कहोरी ॥
आलस निद्रा जब सरसाना । वृत्ती होय सुषुप्ति समाना ॥
ब्रह्मानन्द भोग नहिं भोगी । सजग होहि तिहि औसर योगी ॥
आलस निद्रा दूर हटाई । फेरि वृत्ति निज लेहि जगाई ॥
द्वितिये पुनि विशेष बताई । वृत्ती जबै बहिर है जाई ॥
कछु पदार्थको कारण जाई । अन्तर वृत्ति बहिर्मुख होई ॥
हो सचेत योगी तिहि काला । वृत्ती बहिरंतर सुख बाला ॥
तृतीये राग द्वेश जो होई । नाम कषाय कहाँ लै सोई ॥
राग द्वेष विधि कहो बखानी । यक बाहर एक अन्तर जानी ॥
बाहर धन दारादिक शोचा । अन्तरकी चिंता मन पोचा ॥
भूत भव्य चिन्ता मन आई । योगीकी समाधि विनशाई ॥
चौथे रसास्वाद अब भाषो । ऐसे अर्थ तासुको राखो ॥
ब्रह्मानन्दते सुख अनुभव कर । दुख निवृत्तसे हृदय सुख भर ॥
यहू योगमें विघ्न बताई । जबलों नहिं निज प्रीतम पाई ॥
चितकी पंच भूमिका आही । प्रथमै ज्ञेय नाम कह ताही ॥