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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1795

आगमनिगमबोध

( ७३ )

बहुरि पौनको लेहु उठाई । अनहद चक्र भेदिके जाई ॥
प्रान अपान समाना, तीनों । कण्ठमें तिनहि मेलि तब दीनो ॥
चक्र विशुद्ध कण्ठके माही । षोडश दल है कमल तहाँही ॥
योग लंबिका ताहित करना । दूध अधार ते काया धरना ॥
सूक्ष्म बोलते कार्य कीजै । पुनि तब ऐसी उक्ति गहीजै ॥
जीभके हेटकी नस जो सगरो । मस्का संधो लोनसे रगरो ॥
जीभ दुहन पुनि प्रातहि काला । या विधि रसना करो विशाला ॥
ऐसी अपनी जीभ बढावै । ऊर्ध्व द्वारमें ताहि लगावै ॥
जरमें अमृत चूवै जोई । ताको पान करे तब सोई ॥
पीअत अमृत जागी देहा । योग लंबिका सिद्ध भो येहा ॥
बहुरि विशुद्ध चक्रकी भाना । आगेको तब करे पयाना ॥
अग्नि चक्र है त्रिकुटी थाना । द्वै दल कमल तासु परमाना ॥
ताहि तनेती किया कराई । बत्ती निज नासिका चलाई ॥
नाक शुद्ध करि बत्ती कीता । मूर्द्धा शुद्ध भो ज्ञान गहीता ॥
पुनि उद्यान महा सुख पावै । बहुरि कण्ठते पौन उठावै ॥
चक्र विशुद्ध भेद जब लावै । अग्नि चक्रमें वायू लावै ॥
तिहि औसर जिह्वा लेजाई । ऊरध द्वारे माह लगाई ॥
बन्द करे तब ऊरध द्वारा । अग्नी चक्र भेदि हो पारा ॥
चलि ब्रह्माण्ड श्वास लय होई । कुंभक करिके तनु शिथलोई ॥
काम अरु क्रोध लोभ मोहानी । तब इन सबकी सेन परानी ॥
कर ब्रह्माण्डमें योगी वासा । जबहि चढायो गगनमें श्वासा ॥
जहँ नहि द्यौस नहीं जहँ राती । नहि सूरज शशि उडुगणपाती ॥
तहँ सुषुमना वेधि ब्रह्माण्डा । गडा जाय योगीके झण्डा ॥
जब ब्रह्माण्डमें माहरम जाई । सङ्गी साथी सकल पराई ॥
सङ्गी साथी जब रहि गयऊ । निर्विकल्प योगी तब भयऊ ॥

इति षट्चक्र