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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1775

आगमनिगमबोध

( ५३ )

पुनि वेदान्त सो मता गहीते । कृतम जाल कबहूँ नहि वीते ॥
एक मरे दूजा पुनि होई । कारय जक्त सनातन सोई ॥
दोय प्रकारकि परलय होई । खण्ड प्रलय महा पल्य सोई ॥
खण्डप्रलय पुनि द्वैविधि कीनो । ऐसो ताको लेखा चीन्हो ॥
नाम चतुरमुख कल्प कहीजै । चौदह मन्वंतर तामें कीजै ॥
एक मन्वंतर जब बित जावै । तब जगमें जल प्रलय आवै ॥
पृथ्वी जड चेतन संहारा । सकल नसाहि ताहि जलधारा ॥
एक मन्वन्तरकी थित भाखा । तीस करोर पञ्चासी लाखा ॥
मध्यमें दोय मन्वंतर केरे । संधी नाम तासुको टेरे ॥
सत्रह लक्ष सहस्र अठाइस । तासन्धीको लेख लगाइस ॥
इतने काल जक्त नहि रहई । बरते शून्य वेद अस कहई ॥
बाल भोग लघु परलय जाना । महा प्रलय निश भोजन माना ॥
जब जो महाप्रलय तिहि आवै । मरा जो निश्चय देह सो पावै ॥
होय सकल जब धर्मकी हानी । पाप पयोधि बुडै नर प्रानी ॥
कतहु न दीख अचार बिचारा । मन मत पन्थ जक्त जिव धारा ॥

छन्दोटक

सुत मानत मातु न तात जही । गुरु सेवन देवन दान कही ॥
कलि कौतुक घोर कठोर महा । सुखदुःखितको हरिनाम कहा ॥
कपटी लपटी नर नारि गना । नहि मानत सन्त महन्त जना ॥
तपसी लपसी जग खात फिरे । सुंडिका धनिका बनिकार भिरे ॥
द्विज चिन्ह उनेउ न वेद किया । भगवाँ यक भेष अलेख प्रिया ॥
बहु यंत्रन मन्त्रन दर्व हरी । बिन राम रमे किमि काम सरी ॥
बिरती बिन सिद्ध जती फिरते । नहि ज्ञान है चित बिना थिरते ॥
कलिकाल कराल दुकाल मरी । नर पीडक सो दुख द्रंद भरी ॥
तजि रूपवती युवती भरता । नहि गारि लहो परनारि रता ॥